17 नवंबर, 2013

वैज्ञानिकों के अंधविश्वास

क्या वैज्ञानिक भी अंधविश्वासी हो सकते हैं? कुछ लोगों को यह सवाल ऐसा ही लगेगा कि क्या ऊंचाई से डरने वाले पक्षी हो सकते हैं? लेकिन शायद ज्यादातर आम लोगों को यह सवाल सहज लगे। यह सच है कि वैज्ञानिक अंधविश्वासी भी होते हैं और आस्तिक भी। आम लोगों की अपेक्षा वैज्ञानिकों में ऐसे लोगों का अनुपात शायद ज्यादा हो, जो नास्तिक हों, लेकिन ऐसे वैज्ञानिक भी बहुत हैं, जो बाकायदा धार्मिक हैं। यह भी एक सच है कि कई नास्तिक अंधविश्वासी हो सकते हैं। इसमें अजीब कुछ नहीं है, आखिर वैज्ञानिक भी मनुष्य हैं और मनुष्य कई तरह के होते हैं। वैज्ञानिकों की धार्मिकता और अंधविश्वासों की चर्चा इन दिनों भारत के मंगलयान के संदर्भ में फिर से हो रही है। यह खबर थी कि मंगलयान के छोड़े जाने के पहले इसरो के वैज्ञानिकों ने तिरुपति में भगवान बालाजी की पूजा की, बल्कि हर मिशन के पहले वे भगवान बालाजी की पूजा करते हैं। जहां तक अंधविश्वासों का सवाल है, तो अमेरिकी वैज्ञानिक हर मिशन के पहले मूंगफली खाते और रूसी अंतरिक्ष यात्री यान में सवार होने के पहले जो बस उन्हें ले जाती है, उसके पिछले दाहिने पहिये पर पेशाब करते हैं।

बताया यह भी जाता है कि इसरो के एक पूर्व निदेशक हर रॉकेट के छोड़े जाने के दिन एक नई शर्ट पहनते थे। कुछ अंधविश्वास परंपरागत होते हैं, कुछ व्यक्तिगत होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति अज्ञात में छलांग लगाने को होता है, या कोई बहुत बड़ा काम करने को होता है, तो वह कितना ही भौतिकवादी या नास्तिक हो, अक्सर किसी विश्वास का सहारा खोजता है। निहायत तर्कहीन लगने वाले विश्वास भी अक्सर कुछ मायनों में मददगार होते हैं, क्योंकि वे मनुष्य के संकल्प और दृढ़ता को एक आधार देते हैं और वह ज्यादा आत्मविश्वास व इच्छाशक्ति के साथ कोई काम कर पाता है। विज्ञान और धर्म के बीच का विरोध आम तौर पर वैज्ञानिकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता, उनके लिए भी, जो आस्तिक हैं और उनके लिए भी, जो नास्तिक हैं। यह सवाल उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो आम तौर पर किसी विचारधारा के पक्षधर या विचारक होते हैं, चाहे वह धार्मिक विचारधारा हो या नास्तिक विचारधारा। इसीलिए अगर हम आधुनिक समय के नामी वैज्ञानिकों की सूची बनाएं, तो उसमें कम ही ऐसे लोग निकलेंगे, जो वैज्ञानिक विचारधारा के प्रचारक हों और अगर हम वैज्ञानिकता के कट्टर पक्षधरों की सूची बनाएं, तो उनमें कम ही लोग श्रेष्ठ वैज्ञानिक होंगे।

ये दोनों अलग-अलग किस्म के काम हैं और ऐसे कम लोग मिलेंगे, जो दोनों में दिलचस्पी रखते हों। मंगल पर यान भेजने वाले वैज्ञानिकों के बारे में महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि वे अंधविश्वासी हैं या नहीं, बल्कि यह है कि मंगल पर यान भेज पाते हैं  या नहीं। अगर किसी का विश्वास या अंधविश्वास दूसरे के लिए कोई समस्या पैदा नहीं करता, तो किसी को उससे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मुश्किल, दरअसल किसी विश्वास या अविश्वास की तानाशाही से पैदा होती है। तानाशाही यह मानती है कि हर इंसान एक ही धातु का ढला होता है, उसके अंदर विरोधाभास या बहुआयामिता नहीं होती या नहीं होनी चाहिए। यह दुनिया न अब तक पूरी तरह जानी गई है, न जानी जाएगी, इसमें जितना ज्ञात है, उससे न जाने कितना ज्यादा अज्ञात है। चूंकि अज्ञात, ज्ञात से हमेशा ही ज्यादा रहेगा, इसलिए इंसान अपनी-अपनी तरह से उसमें झांकने की और उससे सामना करने की कोशिश करता रहेगा। इसी कोशिश में ही तो मानवता का विकास हुआ है, उसमें अगर कोई वैज्ञानिक नई शर्ट पहन ले या पी॰एस॰एल॰वी-12 के बाद पी॰एस॰एल॰वी-13 नंबर छोड़ दिया जाए, तो आश्चर्य क्या है।


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