11 जून, 2013

जब मुस्लिमों के मन में बसे राम

      ज़नाब राम को इमाम-ए-हिंदकहने  वाला पहला व्यक्ति ही मुसलमान था। सभी जानते हैं उस उर्दू शायर को, उसी ने कहा था, सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा। लेकिन इकबाल से बहुत पहले और बाद में भी अनगिनत मुस्लिम कवि, संपादक और अनुवादक हुए, जिन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर केन्द्रित रचनाओं का सृजन, संपादन और अनुवाद किया। सबसे पहला सम्मानित नाम है फारसी कवि शेख सादी मसीह का जिन्होंने 1623 ई॰ में दास्ताने राम व सीताशीर्षक से राम कथा लिखी थी। मुगल बादशाह मो॰ अकबर को बेहिचक गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। इस बादशाह ने पहली बार रामायण का फारसी में पद्यानुवाद कराया। अनुवादक थे मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी। शाहजहां के समय रामायण फैजी के नाम से गद्यानुवाद हुआ।
      मुल्ला की मसीही रामायण जहांगीर के जमाने में मुल्ला मसीह ने मसीही रामायण नामक मौलिक रामायण की रचना की। पांच हजार छंद में उन्होंने रामकथा को बद्ध किया था। बाद में 1888 में मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ से यह अनुपम ग्रंथ प्रकाशित हुआ। कट्टर माने जाने वाले मुगल बादशाह औरंगजेब के काल में चंद्रभान बेदिलने रामायण का फारसी पद्यानुवाद किया था। नवाब पीछे क्यों रहते। रामचरित मानस पहली बार लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के जमाने में उर्दू में छपी। इस रामायण में खंड के नाम थे। रहमत की रामायण, फरहत की रामायण, मंजूम की रामायण।
      रामचरित मानस मुसलमानों के लिए भी आदर्श अब्दुल रहीम खान-ए-खाना अकबर के नौ रत्नों में थे और गोस्वामी तुलसीदास के सखा भी। रहीम ने कहा था कि रामचरित मानस हिंदुओं के लिए ही नहीं मुसलमानों के लिए भी आदर्श है। वह लिखते हैं।
रामचरित मानस विमल, संतन जीवन प्राण।
हिंदुअन को वेदसम जमनहिं प्रगट कुरान॥
      कवि संत रहीम ने राम कविताएं भी लिखी हैं। इतिहासकार बदायूंनी अनुदित फारसी रामायण की एक निजी हस्तलिखित प्रति उनके पास भी थी जिसमें चित्र उन्होंने बनवा कर शामिल किये थे। इस 50 आकर्षक चित्रों वाली रामायण के कुछ खंड फेअर आर्ट गैलरी, वॉशिंगटन में अब भी सुरक्षित हैं।
      तुलसीदास से ढाई सौ साल पहले खुसरो ने किया राम का गुणगान रहीम के अलावा अन्य संत कवियों जैसे फरीद, रसखान, आलम रसलीन, हमीदुद्दीन नागौरी ने राम पर काव्य रचना की है। उर्दू हिंदी का पहला कवि अमीर खुसरो ने तुलसीदास जी से 250 वर्ष पूर्व अपनी मुकरियों में राम का जिक्र किया था।
      उर्दू, फारसी और अरबी में लगभग 160 ऐसी पुस्तकें 1916 में उत्तरप्रदेश के एक छोटे कस्बे, गाजीपुर में जन्मे अली जव्वाद ज़ैदी ने अपने जीवन के आखिरी दो दशक देश के कोने-कोने से उर्दू-रामायण की छपी पुस्तकें, पांडुलिपियाँ जमा करने में लगा दिये। उर्दू, फारसी और अरबी में लगभग 160 ऐसी पुस्तको की फ़ेहरिस्त उन्होंने सामने लायी, जिसमें राम का वर्णन है। ये खज़ाना भारत के अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है। दुखद है कि समय ने उनका साथ न दिया और इस फ़ेरहिस्त को पूरा करने और उसको एक पुस्तक का आकार देने का उनका सपना साकार न हो सका। गंगा-जमुनी संस्कृति का दुर्लभ सितारा 2004 की छह दिसंबर की सर्द शाम संसार से कूच कर गया।
      राम के मौजूदा भक्त आज भी नाजऩीन अंसारी, अब्दुल रशीद खाँ, नसीर बनारसी, मिर्जा हसन नासिर, दीन मोहम्मद् दीन, इकबाल कादरी, पाकिस्तान के शायर जफर अली खां जैसे कवि शायर हैं जो राम के व्यक्तित्व की खुशबू से सराबोर रचनाएं कर रहे हैं।
लखनऊ के मिर्जा हसन नासिर रामस्तुति में लिखते हैं।
कंजवदनं दिव्यनयनं मेघवर्णं सुंदरं।
दैत्य दमनं पाप-शमनं सिंधु तरणं ईश्वरं।।
गीध मोक्षं शीलवंतं देवरत्नं शंकरं।
कोशलेशम् शांतवेशं नासिरेशं सिय वरं।।
नाज़नीन की उर्दू में रामचरित मानस राम का ज़िक्र बिना हनुमान के अधूरा माना जाता है। उर्दू में इस अभाव को पूरा किया मंदिरों के शहर वाराणसी की एक मुस्लिम लड़की ने। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय की छात्रा नाजऩीन अंसारी ने हनुमान चालीसा को उर्दू में लिपिबद्ध कर मुल्क की गंगा-जमुनी तहजीब की नायाब मिसाल पेश की है। अब यह लड़की बाबा तुलसी दास द्वारा रचित श्री रामचरित मानसको उर्दू में लिपिबद्ध कर रही है।
सैयद एस॰ क़मर की कलम से