20 जून, 2013

परख: अपने मूल्यवान जीवन की

एक हीरा व्यापारी था जो हीरे का बहुत बड़ा विशेषज्ञ माना जाता था, किन्तु गंभीर बीमारी के चलते अल्प आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। अपने पीछे वह अपनी पत्नी और बेटा छोड़ गया। जब बेटा बड़ा हुआ तो उसकी माँ ने कहा - बेटा, मरने से पहले तुम्हारे पिताजी ये पत्थर छोड़ गए थे, तुम इसे लेकर बाज़ार जाओ और इसकी कीमत का पता लगा, ध्यान रहे कि तुम्हे केवल कीमत पता करनी है, इसे बेचना नहीं है। युवक पत्थर लेकर निकला, सबसे पहले उसे एक सब्जी बेचने वाली महिला मिली। अम्मा, तुम इस पत्थर के बदले मुझे क्या दे सकती हो?”, युवक ने पूछा। देना ही है तो दो गाजरों के बदले मुझे ये दे दो तौलने के काम आएगा।”- सब्जी वाली बोली। युवक आगे बढ़ गया। इस बार वो एक दुकानदार के पास गया और उससे पत्थर की कीमत जानना चाही। दुकानदार बोला, इसके बदले मैं अधिक से अधिक 500 रूपये दे सकता हूँ.. देना हो तो दो नहीं तो आगे बढ़ जाओ।
युवक इस बार एक सुनार के पास गया, सुनार ने पत्थर के बदले 20 हज़ार देने की बात की, फिर वह हीरे की एक प्रतिष्ठित दुकान पर गया वहां उसे पत्थर के बदले 1 लाख रूपये का प्रस्ताव मिला। और अंत में युवक शहर के सबसे बड़े हीरा विशेषज्ञ के पास पहुंचा और बोला, श्रीमान, कृपया इस पत्थर की कीमत बताने का कष्ट करें। विशेषज्ञ ने ध्यान से पत्थर का निरीक्षण किया और आश्चर्य से युवक की तरफ देखते हुए बोला,” यह तो एक अमूल्य हीरा है, करोड़ों रूपये देकर भी ऐसा हीरा मिलना मुश्किल है।मित्रों, यदि हम गहराई से सोचें तो ऐसा ही मूल्यवान हमारा मानव जीवन भी है। यह अलग बात है कि हम में से बहुत से लोग इसकी कीमत नहीं समझ पाते और सब्जी बेचने वाली महिला की तरह इसे मामूली समझ तुच्छ कामों में लगा देते हैं। आइये हम इस मूल्यवान जीवन को समझें, और हीरे के विशेषज्ञ की तरह इस जीवन के मूल्य को आंके


__अंजलि श्रीवास्तव जी की कलम से रचित

13 जून, 2013

जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और...

एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोजाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहां से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए भी पकाती थी, वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी जिसे कोई भी ले सकता था।
एक कुबड़ा व्यक्ति रोज उस रोटी को ले जाता और बजाए धन्यवाद देने के अपने रास्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा, वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बड़ड़ाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका? "एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी "और तब क्या किया कि उसने उस रोटी में जहर मिला दिया जो वो रोज उसके लिए बनाती थी और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली "हे भगवन मैं ये क्या करने जा रही थी?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दिया। और फिर से एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी, हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेके "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा" बड़बड़ाता हुआ चला गया इस बात से बिलकुल बेख़बर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है।
हर रोज जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था। कई महीनों से उसकी कोई ख़ोज-खबर नहीं थी। शाम को उसके दरवाजे पर एक दस्तक होती है, वह दरवाजा खोलती है और भौचक्की रह जाती है, जब अपने बेटे को सामने खड़ा देखती है। वह पतला और दुबला हो गया था। उसके कपड़े फटे हुए थे और वह भूखा भी था, भूख से वह कमजोर हो गया था। जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ। जब मैं एक मील दूर था, तब मैं इतना भूखा था कि गिर कर मर गया होता, लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था, उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया, भूख के मारे मेरे प्राण निकल रहे थे मैंने उससे खाने को कुछ माँगा, उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि "मैं हर रोज यही खाता हूँ लेकिन आज मुझसे ज्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है। सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो "जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा लिया, उसके मस्तिष्क में वह बात घूमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था। अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चुका था "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा”।
निष्कर्ष "हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आपको कभी मत रोको फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या न हो।

__श्री अनुज त्यागी जी की कलम से

चिनुआ अचीबी

11 जून, 2013

जब मुस्लिमों के मन में बसे राम

      ज़नाब राम को इमाम-ए-हिंदकहने  वाला पहला व्यक्ति ही मुसलमान था। सभी जानते हैं उस उर्दू शायर को, उसी ने कहा था, सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा। लेकिन इकबाल से बहुत पहले और बाद में भी अनगिनत मुस्लिम कवि, संपादक और अनुवादक हुए, जिन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर केन्द्रित रचनाओं का सृजन, संपादन और अनुवाद किया। सबसे पहला सम्मानित नाम है फारसी कवि शेख सादी मसीह का जिन्होंने 1623 ई॰ में दास्ताने राम व सीताशीर्षक से राम कथा लिखी थी। मुगल बादशाह मो॰ अकबर को बेहिचक गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। इस बादशाह ने पहली बार रामायण का फारसी में पद्यानुवाद कराया। अनुवादक थे मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी। शाहजहां के समय रामायण फैजी के नाम से गद्यानुवाद हुआ।
      मुल्ला की मसीही रामायण जहांगीर के जमाने में मुल्ला मसीह ने मसीही रामायण नामक मौलिक रामायण की रचना की। पांच हजार छंद में उन्होंने रामकथा को बद्ध किया था। बाद में 1888 में मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ से यह अनुपम ग्रंथ प्रकाशित हुआ। कट्टर माने जाने वाले मुगल बादशाह औरंगजेब के काल में चंद्रभान बेदिलने रामायण का फारसी पद्यानुवाद किया था। नवाब पीछे क्यों रहते। रामचरित मानस पहली बार लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के जमाने में उर्दू में छपी। इस रामायण में खंड के नाम थे। रहमत की रामायण, फरहत की रामायण, मंजूम की रामायण।
      रामचरित मानस मुसलमानों के लिए भी आदर्श अब्दुल रहीम खान-ए-खाना अकबर के नौ रत्नों में थे और गोस्वामी तुलसीदास के सखा भी। रहीम ने कहा था कि रामचरित मानस हिंदुओं के लिए ही नहीं मुसलमानों के लिए भी आदर्श है। वह लिखते हैं।
रामचरित मानस विमल, संतन जीवन प्राण।
हिंदुअन को वेदसम जमनहिं प्रगट कुरान॥
      कवि संत रहीम ने राम कविताएं भी लिखी हैं। इतिहासकार बदायूंनी अनुदित फारसी रामायण की एक निजी हस्तलिखित प्रति उनके पास भी थी जिसमें चित्र उन्होंने बनवा कर शामिल किये थे। इस 50 आकर्षक चित्रों वाली रामायण के कुछ खंड फेअर आर्ट गैलरी, वॉशिंगटन में अब भी सुरक्षित हैं।
      तुलसीदास से ढाई सौ साल पहले खुसरो ने किया राम का गुणगान रहीम के अलावा अन्य संत कवियों जैसे फरीद, रसखान, आलम रसलीन, हमीदुद्दीन नागौरी ने राम पर काव्य रचना की है। उर्दू हिंदी का पहला कवि अमीर खुसरो ने तुलसीदास जी से 250 वर्ष पूर्व अपनी मुकरियों में राम का जिक्र किया था।
      उर्दू, फारसी और अरबी में लगभग 160 ऐसी पुस्तकें 1916 में उत्तरप्रदेश के एक छोटे कस्बे, गाजीपुर में जन्मे अली जव्वाद ज़ैदी ने अपने जीवन के आखिरी दो दशक देश के कोने-कोने से उर्दू-रामायण की छपी पुस्तकें, पांडुलिपियाँ जमा करने में लगा दिये। उर्दू, फारसी और अरबी में लगभग 160 ऐसी पुस्तको की फ़ेहरिस्त उन्होंने सामने लायी, जिसमें राम का वर्णन है। ये खज़ाना भारत के अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है। दुखद है कि समय ने उनका साथ न दिया और इस फ़ेरहिस्त को पूरा करने और उसको एक पुस्तक का आकार देने का उनका सपना साकार न हो सका। गंगा-जमुनी संस्कृति का दुर्लभ सितारा 2004 की छह दिसंबर की सर्द शाम संसार से कूच कर गया।
      राम के मौजूदा भक्त आज भी नाजऩीन अंसारी, अब्दुल रशीद खाँ, नसीर बनारसी, मिर्जा हसन नासिर, दीन मोहम्मद् दीन, इकबाल कादरी, पाकिस्तान के शायर जफर अली खां जैसे कवि शायर हैं जो राम के व्यक्तित्व की खुशबू से सराबोर रचनाएं कर रहे हैं।
लखनऊ के मिर्जा हसन नासिर रामस्तुति में लिखते हैं।
कंजवदनं दिव्यनयनं मेघवर्णं सुंदरं।
दैत्य दमनं पाप-शमनं सिंधु तरणं ईश्वरं।।
गीध मोक्षं शीलवंतं देवरत्नं शंकरं।
कोशलेशम् शांतवेशं नासिरेशं सिय वरं।।
नाज़नीन की उर्दू में रामचरित मानस राम का ज़िक्र बिना हनुमान के अधूरा माना जाता है। उर्दू में इस अभाव को पूरा किया मंदिरों के शहर वाराणसी की एक मुस्लिम लड़की ने। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय की छात्रा नाजऩीन अंसारी ने हनुमान चालीसा को उर्दू में लिपिबद्ध कर मुल्क की गंगा-जमुनी तहजीब की नायाब मिसाल पेश की है। अब यह लड़की बाबा तुलसी दास द्वारा रचित श्री रामचरित मानसको उर्दू में लिपिबद्ध कर रही है।
सैयद एस॰ क़मर की कलम से