17 नवंबर, 2013

वैज्ञानिकों के अंधविश्वास

क्या वैज्ञानिक भी अंधविश्वासी हो सकते हैं? कुछ लोगों को यह सवाल ऐसा ही लगेगा कि क्या ऊंचाई से डरने वाले पक्षी हो सकते हैं? लेकिन शायद ज्यादातर आम लोगों को यह सवाल सहज लगे। यह सच है कि वैज्ञानिक अंधविश्वासी भी होते हैं और आस्तिक भी। आम लोगों की अपेक्षा वैज्ञानिकों में ऐसे लोगों का अनुपात शायद ज्यादा हो, जो नास्तिक हों, लेकिन ऐसे वैज्ञानिक भी बहुत हैं, जो बाकायदा धार्मिक हैं। यह भी एक सच है कि कई नास्तिक अंधविश्वासी हो सकते हैं। इसमें अजीब कुछ नहीं है, आखिर वैज्ञानिक भी मनुष्य हैं और मनुष्य कई तरह के होते हैं। वैज्ञानिकों की धार्मिकता और अंधविश्वासों की चर्चा इन दिनों भारत के मंगलयान के संदर्भ में फिर से हो रही है। यह खबर थी कि मंगलयान के छोड़े जाने के पहले इसरो के वैज्ञानिकों ने तिरुपति में भगवान बालाजी की पूजा की, बल्कि हर मिशन के पहले वे भगवान बालाजी की पूजा करते हैं। जहां तक अंधविश्वासों का सवाल है, तो अमेरिकी वैज्ञानिक हर मिशन के पहले मूंगफली खाते और रूसी अंतरिक्ष यात्री यान में सवार होने के पहले जो बस उन्हें ले जाती है, उसके पिछले दाहिने पहिये पर पेशाब करते हैं।

बताया यह भी जाता है कि इसरो के एक पूर्व निदेशक हर रॉकेट के छोड़े जाने के दिन एक नई शर्ट पहनते थे। कुछ अंधविश्वास परंपरागत होते हैं, कुछ व्यक्तिगत होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति अज्ञात में छलांग लगाने को होता है, या कोई बहुत बड़ा काम करने को होता है, तो वह कितना ही भौतिकवादी या नास्तिक हो, अक्सर किसी विश्वास का सहारा खोजता है। निहायत तर्कहीन लगने वाले विश्वास भी अक्सर कुछ मायनों में मददगार होते हैं, क्योंकि वे मनुष्य के संकल्प और दृढ़ता को एक आधार देते हैं और वह ज्यादा आत्मविश्वास व इच्छाशक्ति के साथ कोई काम कर पाता है। विज्ञान और धर्म के बीच का विरोध आम तौर पर वैज्ञानिकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता, उनके लिए भी, जो आस्तिक हैं और उनके लिए भी, जो नास्तिक हैं। यह सवाल उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो आम तौर पर किसी विचारधारा के पक्षधर या विचारक होते हैं, चाहे वह धार्मिक विचारधारा हो या नास्तिक विचारधारा। इसीलिए अगर हम आधुनिक समय के नामी वैज्ञानिकों की सूची बनाएं, तो उसमें कम ही ऐसे लोग निकलेंगे, जो वैज्ञानिक विचारधारा के प्रचारक हों और अगर हम वैज्ञानिकता के कट्टर पक्षधरों की सूची बनाएं, तो उनमें कम ही लोग श्रेष्ठ वैज्ञानिक होंगे।

ये दोनों अलग-अलग किस्म के काम हैं और ऐसे कम लोग मिलेंगे, जो दोनों में दिलचस्पी रखते हों। मंगल पर यान भेजने वाले वैज्ञानिकों के बारे में महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि वे अंधविश्वासी हैं या नहीं, बल्कि यह है कि मंगल पर यान भेज पाते हैं  या नहीं। अगर किसी का विश्वास या अंधविश्वास दूसरे के लिए कोई समस्या पैदा नहीं करता, तो किसी को उससे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मुश्किल, दरअसल किसी विश्वास या अविश्वास की तानाशाही से पैदा होती है। तानाशाही यह मानती है कि हर इंसान एक ही धातु का ढला होता है, उसके अंदर विरोधाभास या बहुआयामिता नहीं होती या नहीं होनी चाहिए। यह दुनिया न अब तक पूरी तरह जानी गई है, न जानी जाएगी, इसमें जितना ज्ञात है, उससे न जाने कितना ज्यादा अज्ञात है। चूंकि अज्ञात, ज्ञात से हमेशा ही ज्यादा रहेगा, इसलिए इंसान अपनी-अपनी तरह से उसमें झांकने की और उससे सामना करने की कोशिश करता रहेगा। इसी कोशिश में ही तो मानवता का विकास हुआ है, उसमें अगर कोई वैज्ञानिक नई शर्ट पहन ले या पी॰एस॰एल॰वी-12 के बाद पी॰एस॰एल॰वी-13 नंबर छोड़ दिया जाए, तो आश्चर्य क्या है।


साभार

23 अगस्त, 2013

आइये जानें ‘इज़राइल’ को

दक्षिण-पश्चिम एशिया का एक स्वतंत्र यहूदी देश है ‘इज़राइल’। इज़राइल शब्द का इब्रानी भाषा में अर्थ होता है - “ऐसा राष्ट्र जो ईश्वर का प्यारा हो”। यह दक्षिण-पूर्व भूमध्य सागर के पूर्वी छोर पर स्थित है। उन्नीसवीं सदी के अंत में तथा फिर बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यूरोप में यहूदियों के ऊपर किए गए अत्याचार के कारण यूरोपीय (तथा अन्य) यहूदी अपने क्षेत्रों से भाग कर येरुशलम और इसके आसपास के क्षेत्रों में आने लगे। पैलेस्टाइन से ब्रिटिश सत्ता के समाप्त होने पर 14 मई, 1948 ई॰ में आधुनिक इज़राइल राष्ट्र की स्थापना हुई थी। इस बात को आज 65 साल बीत गये। ‘यरुशलम’ इज़राइल की राजधानी है। उसके महत्वपूर्ण शहरों में ‘तेल अवीव’ का नाम आज प्रमुखता से लिया जाता है। यहाँ प्रमुख भाषा इब्रानी (हिब्रू) है, जो दाहिने से बाएँ लिखी जाती है, और यहाँ के निवासियों को ‘इज़रायली’ कहा जाता है।

क्या आप जानते हैं? इज़राइल का कुल क्षेत्रफ़ल 20,700 वर्ग किलोमीटर है जो कि इतना है कि तीन इज़राइल मिलकर भी हमारे उत्तर प्रदेश जितने बड़े नहीं बन सकते।

क्या आप जानते हैं? इज़राइल की कुल आबादी लगभग 74,11,500 है, और ये चारो तरफ से कट्टर इस्लामिक देशों जैसे उत्तर में लेबनान, पूर्व में सीरिया और जॉर्डन, दक्षिण में अकाबा की खाड़ी व दक्षिण-पश्चिम में मिस्र से घिरा हुआ है।

आतंकवादियों के साथ मिलकर चार बार इस्लामिक फंडामेंटिलिस्ट देशों ने अकेले इजराइल पर हमला किया था। पहली बार 1948 में, फिर 1956 में, फिर 1967 में, फिर 1973 में।

अब ज़रा इज़राइल की सैन्य और विदेशनीति भी जान लीजिये, इज़राइल कभी किसी देश पर पहले हमला नहीं करता। और किसी संघठन को यह नहीं कहता की हमारे देश में आंतकवादी घटनायें या हमला मत कीजिये। बल्कि इज़राइल कहता है अगर किसी ने हमारे देश के एक नागरिक को मारा तो हम उस देश में घुसकर कर १०० लोगों को मार देंगे। हाल ही में फिलिस्तीन ने यह गलती की तो इजराइल ने फिलिस्तीन के 5 स्कूलों पर बमबारी कर दी। अगर आप इजराइल के दुश्मन हैं तो आपको इस दुनिया में कहीं भी जिन्दा रह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इजराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी "मोसाद" का नाम जरूर सुना होगा आपने वो आपको और आपके पूरे परिवार को हर पल-पल मरने के लिए मजबूर कर देगी और अंत में आपको और आपके परिवार को आपके के ही घर में बम से उड़ा दिया जायेगा। युद्ध में इजराइल का कोई मुकाबला ही नहीं है जैसे कि मैंने बताया एक बार चार देश एक साथ मिलकर ये कोशिश कर चुके हैं लेकिन अन्ततः उन्हें मुँह की खानी ही पड़ी और बचा- विवादित क्षेत्र भी इज़राइल ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया था। लेकिन भारत कि तरह हर बार दया करके उनकी ज़मीन उन्हें वापस कर दी। क्या कोई इस्लामिक आतंकी गुट ऐसा करेगा? नहीं वह वहाँ के लोकल अवाम को कत्ल कर उनकी संस्कृति, उनके घर को नष्ट करना चाहेगा, लेकिन इज़राइल ने कई मौके मिलने के बावजूद भी ऐसा नहीं किया।

लेकिन आज हालात यह हैं कि दुनिया भर के इस्लामी फंडामेंटलिस्ट इज़राइल को इस धरती से मिटाना चाहते हैं। अमीर अरब शेख और इस्लामिक देश इज़राइल के खिलाफ बयान पर बयान देते हैं और इज़राइल को मिटाने के लिये हर संभव कोशिश कर रहे हैं। एक बेहद घटिया और खौफनाक बयान तो ईरान के अहमेदिज़ेनाद ने यह दिया कि जिस दिन उसके पास परमाणु बम आ जायेगा वह इज़राइल को इस धरती पर से मिटा देगा!

तो आज हालात यह है कि इज़राइल के विरोध का विष इन इस्लामिस्टों ने पूरे विश्व में फैला रखा है और क्योंकि यह पैसा और संख्या दोनों में ही ज्यादा हैं इसलिये इनका जहर धीरे-धीरे समझदार लोगों को भी निगलता जा रहा है।

इसलिये आश्चर्य नहीं होना चाहिये अगर इज़राइल का सब्र अब चुक न जाये। यह याद रखना चाहिये की इज़राइल के पास उन्नत और एटामिक हथियार भी हैं और इज़राइल ने यह भी कहा है कि किसी एटमी हमले की सूरत में वह पूरे आतंकवाद पोषित देशों को समूल नष्ट कर देगा। इसलिये जिन कातिलों के मंसूबे इज़राइल को नष्ट करने के हैं उन्हें याद रखना चाहिये कि वह कोई कमज़ोर देश नहीं है जो इनके अत्याचार को सह ले। इज़राइल का तमाचा जब गाल पर पड़ता है तो गाल लाल हो जाता है और वर्षों सहलाना पड़ता है।

अब इस्लामिक आतंकवादियों के दिन लद चुके हैं। इराक तबाह हो गया, अफगानिस्तान भी, और पाकिस्तान भी तबाह हो रहा है। ईरान के दिन भी जल्द ही आने वाले हैं। जो भी देश विश्व में अशांति फैलायेगा उसे नष्ट होना ही पड़ेगा। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए शांति का संदेश होगा।

15 अगस्त, 2013

ज़नाब ज़रा फिर से गौर फरमाइए !

आज़ हम अपनी आज़ादी की वर्षगांठ का 66वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। एक देश के रूप में हमारी बहुत सी उम्मीदें 66 साल पुरानी हैं, सपने तो शायद उससे भी ज्यादा पुराने हैं। लेकिन हमें मायूस नहीं होना है और निरंतर आगे बढ़ते रहना है।

अब कुछ देशवासी मायूसी के साथ कहते हैं कि- अब खोखले हो गए हैं जय हिन्द के हमारे नारे। अरे ज़नाब यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है।

यह बात भी अपनी जगह पूरी तरह सच है कि 15 अगस्त 1947 से करीब 25 साल पहले जंगे-ए-आज़ादी के किसी सूरमा ने तब ये कहा था कि हम यह अच्छी तरह से समझ लें कि स्वराज तुरंत नहीं आ जायेगा। एक बेहतर सरकार या जनता के लिए सच्ची खुशी पाने में लंबा वक्त लगेगा। उन्होंने सच्चे स्वराज की राह में 4 रुकावटों का जिक्र किया था, जो उनकी निगाह में लोगों की ज़िन्दगी को नर्क बनाने की ताकत रखती है: (1) चुनावी भ्रष्टाचार (2) अन्याय (3) धन की ताकत व निरंकुशता (4) प्रशासनिक अक्षमता।

माना कि इन चारों व्याधियों ने आज़ हमारे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। बल्कि इन्होंने हमें, यानि हमारी तरह तमाम भारतीयों को अपना शिकार भी बना लिया है।

यह ठीक है कि अब भी हज़ार दुश्वारियां हैं। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि आप हमेशा निगेटिव ही क्यों सोचते हैं पाजटिव सोच रखने के लिए भी हमारे पास बहुत कुछ है। अब ज़रा दूसरे पहलू पर भी तो गौर फरमाइए !

ये क्यों नहीं दिखता आपको कि आज़ादी के बाद के सफ़र में आयी चुनौतियों से हम बखूबी निपटे भी तो हैं। क्षेत्रीयता, जनसंख्या, गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और छद्म युद्ध लगातार देश के सामने आए। पर हमारे संविधान कि खूबी ही कुछ ऐसी है कि उसने इन सबसे पार पाने में हमारी मदद की। ये क्या कम है कि गठबंधन सरकार के दौरान भी केंद्र मज़बूत रहता है। हमले होते हैं और हम उसका जवाब भी बखूबी देते हैं। बेशक आज हमारी भारतीय मुद्रा की गिरावट विश्व अर्थव्यवस्था में हमारी दावेदारी के जोख़िम को दर्शाती है लेकिन ज़रा ये सोचिए आज़ हम ऐसे ही नहीं दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं। और उम्मीद है कि 2050 तक हम चीन को पीछे छोड़ देंगे। भाई साहब आज़ हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा सड़कों का नेटवर्क भी तो है जो 19 लाख मील है वो ऐसे ही नहीं बन गया है। आप ये क्यों नहीं सोचते कि वर्तमान में हमारी फ़ौज में 13.25 लाख सैनिक हैं और हमारी फ़ौज दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी सेना है। इंडियन आर्मी के पास 80-100 सक्रिय परमाणु हथियार मौजूद है फिर भी हमें शांत रहना ज्यादा पसंद है। तमाम समस्याओं के बावजूद अच्छी बात यह है कि हमारे पास उम्मीद की कई किरणें भी हैं। हमारी न्यायपालिका तमाम खामियों के बावजूद कई तरह के बाहरी दबावों से मुक्त है। चुनाव आयोग के रूप में हमारे पास ऐसी संस्था है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। अपनी सरकार खुद चुनने की आज़ादी पर कोई ख़तरा नहीं है।

भाई, भारत का सभ्य नागरिक होने के नाते मैं तो कभी अपने देश को बुरा नहीं कहता और ना ही उसे कोसता हूँ। भारत को कोसने वालों से मैं यही कहूँगा कि हज़ार दुश्वारियां के बाद भी हम आगे ही हैं। आज स्वतंत्रता दिवस पर जरूरत है, ऐसी उम्मीदों को बढ़ाने की और तमाम निराशाओं को लगातार कम करने की। वाकई कुछ बात तो है हमारे अंदर जो हस्ती मिटती नहीं हमारी, बरसों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा”। यार कमियाँ हर समाज में होती हैं। भारत में भी हैं। हाँ, हमें अब भी उन बहुत सारी बुराइयों का विरोध करने के साथ-साथ उन्हें दूर करने का प्रयास भी करना है, जो सारे जहाँ से अच्छे इस देश को आगे बढ़ने से रोक रही हैं। यह जरूर है कि इस दौर में भी देश की दिशा और दशा को लेकर बहुत से लोगों की राय अलग-अलग है। फिर भी हमें निरन्तर बढ़ते रहने से कोई नहीं रोक सकता। याद रखें कि “हर आँख का हर आँसू पोछना अब भी हमारा सपना और संकल्प है। यही सबसे बड़ी चुनौती भी है”

किसी ने कहा था कि- “तेरी छांह तले, हम जैसे भी हों जीते तो हैं !”

अंत में सभी को स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ !

जय हिन्द, जय भारत !

20 जून, 2013

परख: अपने मूल्यवान जीवन की

एक हीरा व्यापारी था जो हीरे का बहुत बड़ा विशेषज्ञ माना जाता था, किन्तु गंभीर बीमारी के चलते अल्प आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। अपने पीछे वह अपनी पत्नी और बेटा छोड़ गया। जब बेटा बड़ा हुआ तो उसकी माँ ने कहा - बेटा, मरने से पहले तुम्हारे पिताजी ये पत्थर छोड़ गए थे, तुम इसे लेकर बाज़ार जाओ और इसकी कीमत का पता लगा, ध्यान रहे कि तुम्हे केवल कीमत पता करनी है, इसे बेचना नहीं है। युवक पत्थर लेकर निकला, सबसे पहले उसे एक सब्जी बेचने वाली महिला मिली। अम्मा, तुम इस पत्थर के बदले मुझे क्या दे सकती हो?”, युवक ने पूछा। देना ही है तो दो गाजरों के बदले मुझे ये दे दो तौलने के काम आएगा।”- सब्जी वाली बोली। युवक आगे बढ़ गया। इस बार वो एक दुकानदार के पास गया और उससे पत्थर की कीमत जानना चाही। दुकानदार बोला, इसके बदले मैं अधिक से अधिक 500 रूपये दे सकता हूँ.. देना हो तो दो नहीं तो आगे बढ़ जाओ।
युवक इस बार एक सुनार के पास गया, सुनार ने पत्थर के बदले 20 हज़ार देने की बात की, फिर वह हीरे की एक प्रतिष्ठित दुकान पर गया वहां उसे पत्थर के बदले 1 लाख रूपये का प्रस्ताव मिला। और अंत में युवक शहर के सबसे बड़े हीरा विशेषज्ञ के पास पहुंचा और बोला, श्रीमान, कृपया इस पत्थर की कीमत बताने का कष्ट करें। विशेषज्ञ ने ध्यान से पत्थर का निरीक्षण किया और आश्चर्य से युवक की तरफ देखते हुए बोला,” यह तो एक अमूल्य हीरा है, करोड़ों रूपये देकर भी ऐसा हीरा मिलना मुश्किल है।मित्रों, यदि हम गहराई से सोचें तो ऐसा ही मूल्यवान हमारा मानव जीवन भी है। यह अलग बात है कि हम में से बहुत से लोग इसकी कीमत नहीं समझ पाते और सब्जी बेचने वाली महिला की तरह इसे मामूली समझ तुच्छ कामों में लगा देते हैं। आइये हम इस मूल्यवान जीवन को समझें, और हीरे के विशेषज्ञ की तरह इस जीवन के मूल्य को आंके


__अंजलि श्रीवास्तव जी की कलम से रचित

13 जून, 2013

जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और...

एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोजाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहां से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए भी पकाती थी, वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी जिसे कोई भी ले सकता था।
एक कुबड़ा व्यक्ति रोज उस रोटी को ले जाता और बजाए धन्यवाद देने के अपने रास्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा, वो कुबड़ा रोज रोटी लेके जाता रहा और इन्ही शब्दों को बड़ड़ाता "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा "वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी कि "कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका? "एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली "मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी "और तब क्या किया कि उसने उस रोटी में जहर मिला दिया जो वो रोज उसके लिए बनाती थी और जैसे ही उसने रोटी को को खिड़की पर रखने कि कोशिश कि अचानक उसके हाथ कांपने लगे और रुक गये और वह बोली "हे भगवन मैं ये क्या करने जा रही थी?" और उसने तुरंत उस रोटी को चूल्हे कि आँच में जला दिया। और फिर से एक ताज़ा रोटी बनायीं और खिड़की के सहारे रख दी, हर रोज कि तरह वह कुबड़ा आया और रोटी लेके "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा" बड़बड़ाता हुआ चला गया इस बात से बिलकुल बेख़बर कि उस महिला के दिमाग में क्या चल रहा है।
हर रोज जब वह महिला खिड़की पर रोटी रखती थी तो वह भगवान से अपने पुत्र कि सलामती और अच्छी सेहत और घर वापसी के लिए प्रार्थना करती थी जो कि अपने सुन्दर भविष्य के निर्माण के लिए कहीं बाहर गया हुआ था। कई महीनों से उसकी कोई ख़ोज-खबर नहीं थी। शाम को उसके दरवाजे पर एक दस्तक होती है, वह दरवाजा खोलती है और भौचक्की रह जाती है, जब अपने बेटे को सामने खड़ा देखती है। वह पतला और दुबला हो गया था। उसके कपड़े फटे हुए थे और वह भूखा भी था, भूख से वह कमजोर हो गया था। जैसे ही उसने अपनी माँ को देखा, उसने कहा, "माँ, यह एक चमत्कार है कि मैं यहाँ हूँ। जब मैं एक मील दूर था, तब मैं इतना भूखा था कि गिर कर मर गया होता, लेकिन तभी एक कुबड़ा वहां से गुज़र रहा था, उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसने मुझे अपनी गोद में उठा लिया, भूख के मारे मेरे प्राण निकल रहे थे मैंने उससे खाने को कुछ माँगा, उसने नि:संकोच अपनी रोटी मुझे यह कह कर दे दी कि "मैं हर रोज यही खाता हूँ लेकिन आज मुझसे ज्यादा जरुरत इसकी तुम्हें है। सो ये लो और अपनी भूख को तृप्त करो "जैसे ही माँ ने उसकी बात सुनी माँ का चेहरा पीला पड़ गया और अपने आप को सँभालने के लिए उसने दरवाजे का सहारा लिया, उसके मस्तिष्क में वह बात घूमने लगी कि कैसे उसने सुबह रोटी में जहर मिलाया था। अगर उसने वह रोटी आग में जला के नष्ट नहीं की होती तो उसका बेटा उस रोटी को खा लेता और अंजाम होता उसकी मौत और इसके बाद उसे उन शब्दों का मतलब बिलकुल स्पष्ट हो चुका था "जो तुम बुरा करोगे वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे वह तुम तक लौट के आएगा”।
निष्कर्ष "हमेशा अच्छा करो और अच्छा करने से अपने आपको कभी मत रोको फिर चाहे उसके लिए उस समय आपकी सराहना या प्रशंसा हो या न हो।

__श्री अनुज त्यागी जी की कलम से

चिनुआ अचीबी

11 जून, 2013

जब मुस्लिमों के मन में बसे राम

      ज़नाब राम को इमाम-ए-हिंदकहने  वाला पहला व्यक्ति ही मुसलमान था। सभी जानते हैं उस उर्दू शायर को, उसी ने कहा था, सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा। लेकिन इकबाल से बहुत पहले और बाद में भी अनगिनत मुस्लिम कवि, संपादक और अनुवादक हुए, जिन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर केन्द्रित रचनाओं का सृजन, संपादन और अनुवाद किया। सबसे पहला सम्मानित नाम है फारसी कवि शेख सादी मसीह का जिन्होंने 1623 ई॰ में दास्ताने राम व सीताशीर्षक से राम कथा लिखी थी। मुगल बादशाह मो॰ अकबर को बेहिचक गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। इस बादशाह ने पहली बार रामायण का फारसी में पद्यानुवाद कराया। अनुवादक थे मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी। शाहजहां के समय रामायण फैजी के नाम से गद्यानुवाद हुआ।
      मुल्ला की मसीही रामायण जहांगीर के जमाने में मुल्ला मसीह ने मसीही रामायण नामक मौलिक रामायण की रचना की। पांच हजार छंद में उन्होंने रामकथा को बद्ध किया था। बाद में 1888 में मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ से यह अनुपम ग्रंथ प्रकाशित हुआ। कट्टर माने जाने वाले मुगल बादशाह औरंगजेब के काल में चंद्रभान बेदिलने रामायण का फारसी पद्यानुवाद किया था। नवाब पीछे क्यों रहते। रामचरित मानस पहली बार लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के जमाने में उर्दू में छपी। इस रामायण में खंड के नाम थे। रहमत की रामायण, फरहत की रामायण, मंजूम की रामायण।
      रामचरित मानस मुसलमानों के लिए भी आदर्श अब्दुल रहीम खान-ए-खाना अकबर के नौ रत्नों में थे और गोस्वामी तुलसीदास के सखा भी। रहीम ने कहा था कि रामचरित मानस हिंदुओं के लिए ही नहीं मुसलमानों के लिए भी आदर्श है। वह लिखते हैं।
रामचरित मानस विमल, संतन जीवन प्राण।
हिंदुअन को वेदसम जमनहिं प्रगट कुरान॥
      कवि संत रहीम ने राम कविताएं भी लिखी हैं। इतिहासकार बदायूंनी अनुदित फारसी रामायण की एक निजी हस्तलिखित प्रति उनके पास भी थी जिसमें चित्र उन्होंने बनवा कर शामिल किये थे। इस 50 आकर्षक चित्रों वाली रामायण के कुछ खंड फेअर आर्ट गैलरी, वॉशिंगटन में अब भी सुरक्षित हैं।
      तुलसीदास से ढाई सौ साल पहले खुसरो ने किया राम का गुणगान रहीम के अलावा अन्य संत कवियों जैसे फरीद, रसखान, आलम रसलीन, हमीदुद्दीन नागौरी ने राम पर काव्य रचना की है। उर्दू हिंदी का पहला कवि अमीर खुसरो ने तुलसीदास जी से 250 वर्ष पूर्व अपनी मुकरियों में राम का जिक्र किया था।
      उर्दू, फारसी और अरबी में लगभग 160 ऐसी पुस्तकें 1916 में उत्तरप्रदेश के एक छोटे कस्बे, गाजीपुर में जन्मे अली जव्वाद ज़ैदी ने अपने जीवन के आखिरी दो दशक देश के कोने-कोने से उर्दू-रामायण की छपी पुस्तकें, पांडुलिपियाँ जमा करने में लगा दिये। उर्दू, फारसी और अरबी में लगभग 160 ऐसी पुस्तको की फ़ेहरिस्त उन्होंने सामने लायी, जिसमें राम का वर्णन है। ये खज़ाना भारत के अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है। दुखद है कि समय ने उनका साथ न दिया और इस फ़ेरहिस्त को पूरा करने और उसको एक पुस्तक का आकार देने का उनका सपना साकार न हो सका। गंगा-जमुनी संस्कृति का दुर्लभ सितारा 2004 की छह दिसंबर की सर्द शाम संसार से कूच कर गया।
      राम के मौजूदा भक्त आज भी नाजऩीन अंसारी, अब्दुल रशीद खाँ, नसीर बनारसी, मिर्जा हसन नासिर, दीन मोहम्मद् दीन, इकबाल कादरी, पाकिस्तान के शायर जफर अली खां जैसे कवि शायर हैं जो राम के व्यक्तित्व की खुशबू से सराबोर रचनाएं कर रहे हैं।
लखनऊ के मिर्जा हसन नासिर रामस्तुति में लिखते हैं।
कंजवदनं दिव्यनयनं मेघवर्णं सुंदरं।
दैत्य दमनं पाप-शमनं सिंधु तरणं ईश्वरं।।
गीध मोक्षं शीलवंतं देवरत्नं शंकरं।
कोशलेशम् शांतवेशं नासिरेशं सिय वरं।।
नाज़नीन की उर्दू में रामचरित मानस राम का ज़िक्र बिना हनुमान के अधूरा माना जाता है। उर्दू में इस अभाव को पूरा किया मंदिरों के शहर वाराणसी की एक मुस्लिम लड़की ने। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय की छात्रा नाजऩीन अंसारी ने हनुमान चालीसा को उर्दू में लिपिबद्ध कर मुल्क की गंगा-जमुनी तहजीब की नायाब मिसाल पेश की है। अब यह लड़की बाबा तुलसी दास द्वारा रचित श्री रामचरित मानसको उर्दू में लिपिबद्ध कर रही है।
सैयद एस॰ क़मर की कलम से

18 अप्रैल, 2013

जानिए ‘हिन्दू धर्म’ के बारे में

मैं देख रहा हूँ कि इन दिनों सोशल साइटों पर फेसबुकिया टाइप बक-बक करते हुए चंद नौजवान साथियों ने अपनी-अपनी बुद्धि व सोच के आधार पर हिन्दू धर्म की प्रकृति के सम्बन्ध में अपने-अपने राग अलापने शुरू कर दिये हैं। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि अपने-अपने विचार व्यक्त करते हुए इन लोगों ने धर्म के नाम पर जैसे धर्मयुद्ध शुरू कर दिया है। अपने नित्य प्रवचन के द्वारा ये लोग सतही जानकारी लोगों फैला कर खुद ही खुश हो रहे हैं। मुझे तो इनमें से अधिकांश की सोच वर्तमान राजनीति से प्रेरित लगती है। उस राजनीति से जो हिन्दू धर्म को अपने लक्ष्यों के अनुरूप परिभाषित करना चाहती है। इनके सारे प्रवचनों में जो मार्क करने वाली बात है वो ये है कि हम अच्छे है बाकी सब बेकार हैं। अरे भाई- खुद को तो अच्छा सभी कह लेते हैं, दूसरों को अच्छा कहो, तो कुछ बात है। अब उन्हीं लोगों के नित्य प्रवचन को पढ़कर या सुनकर मैंने कई लोगों के मुखारबिंदु से सुना कि- हिन्दू धर्म कोई धार्मिक समुदाय ही नहीं है। यह तर्क है तो नितांत हास्यापद है। लेकिन मैं भी उनकी जानकारी के 'अभाव' की दाद देने लगा। अब यार जानकारी की दाद तो सभी दे लेते हैं लेकिन उसके अभाव की भी दाद देना जरूरी बनता हैं न।
तो मेरे प्यारे विद्वान दोस्तों ज़रा नीचे भी पढ़ लो, हो सकता मेरी जानकारी आपके अभाव को दीमक की तरह चाट जाए।
हिन्दू धर्म में अलौकिक शक्ति की अवधारणा बहुस्तरीय हैं। इसकी शुरुआत होती है बहुदेववाद से, जिसमें अलग-अलग देवी-देवताओं के अलग-अलग कार्यक्षेत्र है। मसलन इन्द्र जी वर्षा के देवता हैं तो मारुति जी वायु के देवता हैं। शक्ति की प्रतीक माँ दुर्गा हैं तो माँ सरस्वती ज्ञान की देवी। यहाँ तक कि सेक्स-सम्बन्धी मामलों का भी एक अलग देवता कामदेव जी हैं। इसके ऊपर का स्तर त्रिदेववाद का है, जहां ब्रम्हा जी सृष्टि के निर्माता हैं, तो विष्णु जी पालनहार, और शिव जी विनाशक हैं। तीसरे स्तर पर एकेश्वरवाद है, जिसमें केवल एक ईश्वर की परिकल्पना है। वायु पुत्र हनुमान जी’ भी एक पौराणिक चरित्र हैं, राम जी के सेवक। उन्हें भी भगवान का दर्जा प्राप्त है।
ये सारी अवधारणाएँ हिन्दू धर्म का भाग हैं। हिन्दू धर्म के अलग-अलग पंथ, अलग-अलग देवताओं की आराधना करते हैं। इनमें से कुछ विष्णु जी के अवतार हैं जैसे राम और कृष्ण। ऐसा ही, यूनानी धर्मशास्त्र में भी कुछ इसी तरह का बहुदेववाद पढ़ने को मिलता है। ईसाई धर्म में पिता-पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रिदेववाद प्रचलित है। ये सभी मान्यताएँ धर्म-विशेष से जुड़ी हुई हैं और इतर धर्मों पर लागू नहीं होती। हम जानतें हैं कि बौद्ध व जैन जैसे कुछ धर्मों में अलौकिक शक्तियों पर विश्वास नहीं किया जाता। भारत में विकसित कुछ और धार्मिक परम्पराओं जैसे चवार्क की भी अलौकिक शक्तियों में आस्था नहीं थी।
इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दू धर्म में विभिन्न धाराएं हैं परन्तु इसका कारण यह है कि इस धर्म का कोई एक पैगम्बर नहीं है। यह धर्म किस्तों में, एक लंबे अंतराल में, अस्तित्व में आया है। इसलिए इस धर्म में विभिन्नतायें तो हैं परन्तु ये विभिन्नतायें हमें यह इजाज़त कदापि नहीं देतीं कि हम इसे एक धर्म ही न मानें। इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दू धर्म कि कोई सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है। इसके कई कारण हैं, पहला यह कि इस धर्म का कोई एक जन्मदाता नहीं है। दूसरा यह कि दुनिया के इस भू-भाग में उभरे विभिन्न धर्मों को हिन्दू धर्म का हिस्सा मान लिया गया है और तीसरे, हिन्दू धर्म में इतनी विभिन्नतायें है कि उसे एक झंडे-तले रखना मुश्किल प्रतीत होता है। विशेष बात यह है कि अलग-अलग समय में स्थापित परम्परायें और कर्मकाण्ड, आज भी इस धर्म का हिस्सा बने हुए हैं। भगवान सत्यनारायण से लेकर माँ संतोषी और माँ दुर्गा से लेकर निराकार, निर्गुण ईश्वर तक कि परिकल्पनायें इस धर्म में एक साथ जीवित हैं। यहाँ तक कि चावर्क दर्शन और लोकायत दर्शन भी यहीं मौजूद हैं।
हिन्दू धर्म जिस मामले में अन्य धर्मों से भिन्न है वह है उसकी जाति व्यवस्था। यह धर्म सामाजिक ऊंच-नीच को धार्मिक स्वीकार्यता प्रदान करता है। जाति व्यवस्था को ‘हिन्दू धर्म’ के ग्रंथों और उसकी परम्पराओं व रीति-रिवाज़ों में स्वीकृति प्राप्त है। जिन परिस्थितियों में यह व्यवस्था अस्तित्व में आयी, उनसे भी हमें इसे समझने में मदद मिलती है। आर्य, जो कई दौरों में भारत आये, पशुपालक और बहुदेववादी थे। शुरुआती दौर में वेद रचे गए, जो तत्कालीन समाज़ के मूल्यों की झलक हमें दिखलाते हैं। वह बहुदेववाद का युग था और उस समय ऐसा माना गया अलग-अलग देवताओं के पास अपने-अपने विभाग थे। मनु के नियम समाज के पथपदर्शक थे। वैदिक युग के बाद आया, ब्राह्मणवाद का युग, जिसमें समाज़ बाहरी प्रभावों से दूर रहा। जाति व्यवस्था के चलते, समाज़ का अभिजात्य वर्ग को सामान्य जनों से दूरी बनाने में जाति व्यवस्था ने मदद की। इसके बाद, जाति व्यवस्था को बौद्ध धर्म की चुनौती ने ब्राह्मणवाद को बदलने पर मज़बूर किया और उसके नतीजे में यह अस्तित्व में आया, जिसे हम आज ‘हिन्दू धर्म’ कहते हैं। इस दौर में पंथिक प्रथाओं के निर्वहन में आमजनों को भी शामिल किया गया और सार्वजनिक कर्मकाण्डों और अनुष्ठानों का सिलसिला प्रारम्भ किया गया ताकि आम लोगों को बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने से रोका जा सके। यह दिलचस्प है कि आठवीं शताब्दी तक, तथाकथित हिंदु ग्रन्थों में, हिन्दू शब्द का कहीं प्रयोग नहीं किया गया है। यह शब्द तो अरब निवासियों और मध्य-पूर्व के मुसलमानों के इस भू-भाग पर आगमन के बाद अस्तित्व में आया है। ये सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दू कहने लगे थे। प्रारम्भ में हिन्दू शब्द का भौगोलिक अर्थ था। इसके बाद, इस क्षेत्र में विकसित हो रहे धर्मों को हिन्दू धर्मों की संज्ञा दी गयी। जाति व्यवस्था के कारण, हिन्दू धर्म में धर्म प्रचार के लिए कोई स्थान नहीं था। उल्टे, जाति व्यवस्था के पीड़ितों ने बौद्ध, इस्लाम और बाद में ईसाई व सिख धर्मों को अपनाने की हर संभव कोशिश की। हिन्दू धर्म में भी दो धाराएं स्पष्ट नज़र आती हैं – ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा। श्रमण परंपरा ने जाति व्यवस्था को ख़ारिज किया और ब्राह्मणों के प्रभुत्व का विरोध। ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व बना रहा परन्तु साथ ही, अन्य धाराएं जैसे तंत्र, भक्ति, शैव, सिद्धांत आदि का अस्तित्व भी बना रहा। श्रमण परंपरा ने वैदिक नियमों और मूल्यों को तरजीह नहीं दी। जहां ब्राह्मणवाद, समाज को जातियों के खांचों में बांटता था, वहीं श्रमणवादी इस विभाजन के विरोधी थे। ब्राह्मणवाद हिन्दू धर्म की प्रधान धारा इसलिए बना रहा क्योंकि उसे राज्याश्रय मिला। कालांतर में, नीची जातियों की धार्मिक परंपराओं को नकार कर, ब्राह्मणवाद को ही हिन्दू धर्म के रूप में स्वीकार कर लिया गया। यह प्रक्रिया, मगध-मौर्य साम्राज्य के दौरान बौद्ध व जैन धर्मों के दमन के बाद शुरू हुई। बाद में अंग्रेजों ने भारतीय समाज को समझने के अपने प्रयास के चलते सभी गैर-ईसाई व गैर-मुसलमानों को, ब्राह्मणवादी मानदंडों पर आधारित, हिन्दू पहचान दे दी। वेदों व अन्य ब्राह्मणवादी ग्रंथों को हिन्दू ग्रंथ कहा जाने लगा। इस प्रकार हिन्दू धर्म में निहित विभिन्नताओं को परे रखकर, केवल ब्राह्मणवाद को हिन्दू धर्म का दर्ज़ा दे दिया गया। जिसे हम आज हिन्दू धर्म कहते हैं, दरअसल वह, ब्राह्मणवादी कर्मकांडों, ग्रंथों व ब्राह्मणों की सत्ता पर आधारित है। वर्तमान हिन्दू धर्म, धर्म के सभी समाजशास्त्रीय मानदंडों पर खरा उतरता है। यह अलग बात है कि उस पर ब्राह्मणवाद का वर्चस्व है अब कुछ लोगों का यह कहना कि हिन्दू धर्म कोई धार्मिक समुदाय नहीं है, पूरी तरह से गलत है।