08 मार्च, 2011

टेलिपोर्टेशन और मैँ

आज से करीब 20-25 साल पहले मैंने अपने ब्लैक & व्हाइट टी.वी पर एक साइंस फिक्शन इंगलिश सीरियल 'स्टारट्रैक' देखा था, जो रविवार को आता था। वो सीरियल मुझे बहुत पसंद था।
उस सीरियल की एक खास बात जो मुझे बहुत पसंद थी वो ये की सीरियल के पात्र कैप्टन किर्क, स्पोक  और डॉ॰ मैककॉय जब कहीं अन्तरिक्ष में आते-जाते थे तो गायब हो कर वहाँ अवतरित हो जाते थे, वो तो मैँने बहुत दिनों बाद जाना कि उस क्रिया को 'टेलिपोट्रेशन' कहते हैँ। जिसकी मदद से किसी भी जीते-जागते इंसान को कहीँ भी भेजा जा सकता है। फिर मैँने पढ़ा की इस तकनीकी पर काफी रिसर्च चल रही है। और अब इस रोमांचक कल्पना के हक़ीकत में बदलने के आसार बढ़ गए लगते है। वैज्ञानिकों की रिसर्च कहाँ तक आ पहुँची है आइए कुछ इसके बारे में भी पता करते हैं:- ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने टेलीपोर्टेशन यानि किसी चीज़ को एक जगह ग़ायब कर किसी दूसरे स्थान उसका हूबहू प्रतिरूप उत्पन्न करने में सफलता हासिल की है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक एक प्रकाश पुँज को एक जगह ग़ायब कर कुछ दूरी पर उसे फिर से पाने में सफल रहे हैं। इस प्रयोग से इतना तो ज़ाहिर हो ही गया है, कि कम से कम सिद्धान्त: टेलीपोर्टेशन संभव है। उप परमाण्विक यानि परमाणु से भी छोटे कणों के मामले में  टेलीपोर्टेशन की संभावना काफ़ी ज़्यादा है। इससे आगे यानि परमाणु स्तर पर  टेलीपोर्टेशन कब संभव हो पाता है। यह देखने वाली बात होगी। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि छोटे स्तर पर ही सही, यदि  टेलीपोर्टेशन व्यावहारिक साबित हुआ तो इसके दूरसंचार के क्षेत्र में काफ़ी उपयोग हो सकेंगे।
क्या है टेलीपोर्टेशन?
'टेलीपोर्टेशन' विज्ञान गल्प के लेखकों द्वारा गढ़ा एक शब्द है. यह 'टेलीकम्युनिकेशन' और 'ट्रांसपोर्टेशन' शब्दों के मेल से बना है. यानि टेलीपोर्टेशन का मतलब हुआ दूरसंचार माध्यमों के ज़रिए परिवहन। भौतिकविदों, ख़ास कर क्वांटम मैकेनिक्स यानि पदार्थों की मूल संरचना पर अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों के लिए टेलीपोर्टेशन एक चुनौती भरा विषय रहा है। पहली बार 1998 में कैलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में एक अनुसंधान में यह बात सामने आई कि टेलीपोर्टेशन यानि किसी तत्व को मूल कणों में तोड़ कर वापस कहीं और उसका हूबहू प्रतिरूप उत्पन्न करना संभव है।
इस घोषणा के बाद दुनिया भर की कोई 40 प्रयोगशालाओं में टेलीपोर्टेशन पर गंभीरता से काम शुरू हुआ। ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में 'क्वांटम इंटैंग्लमैंट' नामक अवधारणा का उपयोग किया। क्वांटम इंटैंग्लमैंट की अवधारणा का उपयोग करते हुए ऑस्ट्रेलियाई भौतिकविद पिंग कोय लैम ने एक ऑप्टिकल संचार तंत्र के एक सिरे पर लेज़र प्रकाश को मूल कणों में तोड़ कर उसे एक मीटर दूर फिर से जोड़ने में सफलता पाई। प्रयोग के बारे में लैम ने कहा, "हमने ये दिखाया कि भारी तादाद में प्रकाश के वाहक ऊर्जा कणों यानि फ़ोटॉन को किसी एक जगह नष्ट कर, कहीं और उन्हें पाना बिल्कुल संभव है।"

ह्यूमन  टेलीपोर्टेशन
क्या अंतत: टेलीपोर्टेशन विज्ञान गल्पों के उस रोमांचक दृश्य को सही साबित कर पाएगा जिसमें कि किसी व्यक्ति को एक जगह मूल भौतिक कणों में तोड़ कर सारी सूचनाएँ सैंकड़ो किलोमीटर दूर पहुँचाई जाती है, जहाँ उन सूचनाओं के आधार पर उस व्यक्ति की हूबहू प्रतिकृति उत्पन्न की जाती है?
ये तो भविष्य ही बताएगा कि अंतत: टेलीपोर्टेशन किस हद तक जाता है, लेकिन लैम को भरोसा है कि भविष्य में दूरसंचार के क्षेत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने कहा कि क्वांटम टेलीपोर्टेशन ने कूटबद्ध संदेशों को शतप्रतिशत सुरक्षित बनाया जा सकेगा। मानव के टेलीपोर्टेशन के बारे में पूछे जाने पर लैम ने कहा कि इसके लिए ऐसे मशीनों के निर्माण की ज़रूरत होगी जो कि मानव शरीर में शामिल अरबों ख़रबों की संख्या में परमाणुओं का सटीक विश्लेषण कर सके।
उन्होंने कहा, "मैं समझता हूँ इस तरह का टेलीपोर्टेशन बहुत-बहुत दूर की बात है. अभी तो स्थिति ये है कि हम एक परमाणु तक को टेलीपोर्ट करने की विधि नहीं जान पाए हैं।"
ह्यूमैन टेलीपोर्टेशन की बात करते समय हमें यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि संभव दिख रहे क्वांटम टेलीपोर्टेशन में मूल फ़ोटॉन कण नष्ट हो जाते हैं और उनकी प्रतिकृति मात्र ही दूसरी जगह उपलब्ध हो पाती है।