01 मार्च, 2011

आंकड़े बोलते हैं...

अमेरिका स्थित पिऊ रिसर्च सेंटर की हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में 1 बिलियन और 570 मिलियन मुसलमान हैं। मतलब दुनिया का हर चौथा आदमी मुसलमान है। दुनिया की चौथाई आबादी होने के बाद भी आज मुसलमान वैज्ञानिक-तकनीकी तौर पर पिछड़े हैं, राजनीतिक रूप से भी हाशिये पर हैं और आर्थिक रूप से बहुत ग़रीब। ऐसा क्यों है? विश्व के सकल घरेलू उत्पाद, जो 60 ट्रिलियन डॉलर है, में मुसलमानों की भागीदारी केवल 3 ट्रिलियन डॉलर है, जो फ्रांस जैसे छोटे देश, जिसकी जनसंख्या 70 मिलियन है, से भी कम है और जापान के सकल घरेलू उत्पाद की आधी है तथा अमेरिका, जिसकी जनसंख्या 300 मिलियन है, के सकल घरेलू उत्पाद का पांचवा हिस्सा है। ऐसा क्यों? यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि विश्व की 35 फ़ीसदी जनसंख्या ईसाई है, लेकिन यही 35 फ़ीसदी लोग विश्व की 70 फ़ीसदी धन-संपत्ति के मालिक हैं।
     मानव विकास सूचकांक यानि एच॰डी॰आई॰ में भी यदि कुछ तेल निर्यात करने वाले देशों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी मुसलमान देश बहुत नीचे आते हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी मुसलमान देश बहुत पीछे हैं। विज्ञान के क्षेत्र में बस 500 शोधपत्र यानि पी॰एच॰डी जमा होते हैं। यह संख्या अकेले इंग्लैंड में 3000 है। 1901 से लेकर 2008 तक लगभग 500 नोबल पुरस्कारों में से यहूदियों को 140 बार यह पुरस्कार पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो लगभग 25 फ़ीसदी है। जबकि यहूदियों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की केवल 0.2 फ़ीसदी है। इसके विपरीत आज तक मात्र एक मुसलमान को यह पुरस्कार पाने का अवसर मिला है। (एक और भी था, लेकिन पाकिस्तान ने उसे गैर मुसलमान घोषित कर दिया) मतलब यह की मुसलमानों की इस पुरस्कार में भागीदारी 0.2 फ़ीसदी है यानि विज्ञान के क्षेत्र में मुसलमानों का योगदान नगण्य है। एक और नकारात्मक तथ्य निकल कर आया, शंघाई विश्वविध्यालय द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के आधार पर, इसमें विश्व के 400 सबसे बढ़ियाँ विश्वविध्यालय की एक सूची है और इस्लामी देशों का एक भी विश्वविध्यालय इस सूची में नहीं हैं। यह बड़ी दुःखद बात है, क्योंकि 7वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक दुनिया के सबसे बड़े और आलिम विश्वविध्यालय मुस्लिम देशों में स्थित थे। कोरडोबा, बग़दाद और काइरो इस्लामिक तालिम के नामचीन केंद्र थे।
     विज्ञान के जाने-माने इतिहासकार जिलेस्पी ने ऐसे 130 महान वैज्ञानिकों एंव और प्रौद्योगिक विशेषज्ञों की सूची बनाई है, जिनका मध्ययुग में बहुत बड़ा योगदान था इनमें से 120 ऐसे थे, जो मुसलमान देशों से थे और केवल 4 यूरोप से थे। क्या यह तथ्य ख़ुद में इतना अर्थपूर्ण नहीं की मुसलमान अपने भूत को विवेचित करें, अपने आज को ईमानदारी से देखें और अपने भविष्य की तार्किक रूप से कल्पना करें। मैं मुसलमानों की इस आबादी के बारे में कुछ और रोचक तथ्य बता सकता हूँ, जो अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किए गए शोधों पर आधारित हैं। आज की प्रजनन रफ्तार से मुसलमानों की जनसंख्या अगले 500 सालों में दोगुनी हो जाएगी। तब मुसलमान संख्या में ईसाईयों से अधिक हो जाएंगे, जिनकी जनसंख्या भी दोगुनी होगी। मतलब यह की मुसलमानों की समस्याएँ और बढ़ जाएंगी। आज की बेरोजगारी और आर्थिक ग़रीबी, जो मुस्लिम समाज और मुस्लिम देशों में व्याप्त है। वह ज़ाहिर तौर पर और बढ़ेगी। अगले 50 सालों में अगर मुस्लिम जनसंख्या बढ़कर दोगुनी हो गई तो मुसलमान और ईसाई देशों के बीच आर्थिक विकास की दूरी और बढ़ेगी। प्रश्न फिर यह उठता है कि इस शताब्दी या आने वाली सदी में विश्व पर किसकी सार्वभौमिकता और प्रभुसत्ता रहेगी, 5 फीसदी संसाधन वाले मुसलमानों कि या 70 फीसदी संसाधन वाले ईसाइयों की?
     मुसलमानों को यह याद रखने की जरूरत है कि आज के वैज्ञानिक विकास से परिभाषित विश्व में किसी भी देश की इज्ज़त और शक्ति उसकी जनसंख्या पर आधारित नहीं है। आज के विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ही शक्ति, इज्ज़त और संसाधनो की गारंटी है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां अधिक जनसंख्या के साथ आर्थिक पिछड़ापन और कम सामरिक सामर्थ्य है। यहूदी देश इज़राइल को देखिए, इतना छोटा देश पूरे अरब पर हावी रहता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह एक आर्थिक, सामरिक और वैज्ञानिक रूप से समृद्ध देश है, जिसके सामने पिछड़ेपन के शिकार अरब देशों को झुकना पड़ता है, हार मान लेनी पड़ती है। एक तरफ वे मुसलमान हैं, जो आज पश्चिमी देशों में रहते हैं और अपनी समृद्धि से खुश हैं। जबकि वहीं वे मुसलमान भी हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य देशों के बाशिंदे हैं और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन में डूबे हुए हैं। यूरोप में रहने वाले 20 मिलियन मुसलमानों का सकल घरेलू उत्पाद पूरे भारतीय महाद्वीप के 500 मिलियन मुसलमानों से अधिक है।
     निस्सीम हसन एक ख्याति प्राप्त इस्लामिक विद्वान हैं। वह कहते हैं कि मुसलमानों में ज्ञानार्जन की घटती प्रवृत्ति ही उनके आर्थिक और राजनीतिक पन का मुख्य कारण है। हमने सदियों से मानवता का नेतृत्व छोड़ दिया है। हम लकीर के फ़कीर बन कर रह गए हैं। महातिर मोहम्मद, जो मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री हैं, ने मुसलमानों को सही सलाह दी। उन्होने ओ॰आई॰सी॰ की मीटिंग में कहा की मुसलमानों को अपनी रूढ़िवादिता छोड़कर नए समय में नई पहचान बनानी चाहिए, क्योंकि सामाजिक परिस्थितियाँ अब बदल चुकी हैं। यह याद रखने की बात है की 8वीं से 14वीं शताब्दी के बीच जब मुसलमान स्पेन पर राज करते थे, तब स्पेन की आमनी बाकी सारे यूरोप से धिक थी। ऐसा इसलिए था, क्योंकि स्पेन तब उच्च शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। आज स्थिति उलट-पलट हो गई है। आज ईसाई स्पेन का सकल घरेलू उत्पादन विश्व के 12 तेल निर्यात करने वाले मुस्लिम देशों से कहीं अधिक है। मुस्लिम शासन के दौरान सभी देशों का इतना ही अच्छा हाल था। बग़दाद,मास्कस, काहिरा एंव त्रिपोली अपनी वैज्ञानिक दूरदृष्टि के लिए विख्यात थे। इन मध्ययुगीन शताब्दियों में मुस्लिम देशों को आर्थिक, सांस्कृतिक एंव बौद्धिक रूप से बहुत विकसित माना जाता था। इसके विपरीत डोनाल्ड कैम्बेल (सर्जन-फ्रांस) के अनुसार, जब मुस्लिम देशों में विज्ञान की आँधी चल रही थी, तब यूरोप अंधकार में जी रहा था, जब इस्लाम का उद्भव हो रहा था और वह संसार पर हावी हो रहा था, तब मुसलमानों की जनसंख्या बमुश्किल 10 फ़ीसदी थी।

डॉ एम॰आई॰एच फारुखी
(लेखक एन॰बी॰आर॰आई॰ के अवकाश प्राप्त वैज्ञानिक हैं)
संकलन: dharmendra61
सौजन्य: चौथी दुनिया