14 मार्च, 2011

चाँद – एक वैज्ञानिक पक्ष


लगभग सभी लोग यह जानते हैं कि चन्द्रमा हमारी पृथ्वी के गिर्द परिभ्रमण करता है। हमारे सौरमण्डल के अन्य ग्रहों कि अपेक्षा चन्द्रमा पृथ्वी के काफी समीप है यानि महज़ 2 लाख 40 हज़ार मील के फासले पर।
      चाँद के निर्माण के बारे में जो सबसे मशहूर अनुमान हैं, उसके अनुसार चाँद का  जन्म साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व उस समय हुआ थाजब थीया नामक मंगल ग्रह के आकार के एक पिंड की टक्कर पृथ्वी से हुई थी। इस टक्कर के बाद खरबों टन का मैग्मा और पत्थर पृथ्वी की कक्षा में पहुंचा था जो ठंडा होकर चाँद बना था। हालांकि यह सिद्धांत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसके अनुसार पृथ्वी पर किसी समय मैग्मा का महासागर थालेकिन ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। इसके बावजूदचाँद के निर्माण की प्रक्रिया यह सिद्धांत अन्य किसी की अपेक्षा बेहतर तरीके से समझाता है।
सौरमंडल के निर्माण के समय जब ग्रहों की सरंचना चल रही थीयह स्थान बेहद भीड़ भरा था। ग्रहों की कक्षाएं अपना स्थान ले रही थी और कई एस्टरॉयड इधर-उधर उड़ रहे थे। एक अपेक्षाकृत स्थिर आकाशीय चट्टान L5 की पृथ्वी के साथ विशेष घनिष्ठता थी। पृथ्वी की कक्षा में लेकिन उससे अलग अस्तित्व बनाए रखने वाला L5 आधुनिक ट्रोजन उल्काओं का घर भी है। L5 का पिंड आकार धीर-धीरे बढ़ने पर यह अस्थिर होने लगा था। जल्दी ही इसके दोलने से यह पृथ्वी से टकराया। इस टक्कर से छिटक कर हटा पदार्थ ही कालांतर में चाँद के तौर पर सामने आया जो शुरुआत में महासागरों से अटा था जिनके प्रमाण अपोलो यान के एस्ट्रोनॉट्स को मिले हैं।
अपने अपेक्षतया बड़े आकार की पृथ्वी के गिर्द चक्कर काटने वाला चाँद पृथ्वी के लिए कई मायनों में जरूरी कार्य भी करता है। हैरानी की बात यह है कि पृथ्वी के ही समान आकार के शुक्र का कोई उपग्रह नहीं है। एक अन्य समान आकार ग्रह मंगल के उपग्रह बेहद छोटे हैं जो औसतन 20 किलोमीटर अर्द्धव्यास के हैं। इस दृष्टि से चाँद सौर मंडल के सबसे बड़े उपग्रहों में से एक है। चाँद के अस्तित्व में आने के पीछे के सिद्धांत के बारे में एक अनुमान यह भी है कि उसकी सतह पृथ्वी से मिलती-जुलती है। इसके बारे में वैज्ञानिकों ने कई चंद्र अभियानों के बाद ही ‘महाटक्कर’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।

12 मार्च, 2011

गरीबों की भी सुनो...

मैं अक्सर सोचा करता हूँ कि हमारे देश में आज भी कितने लोग एक दिन का राशन नहीं जुटा पाते, बहुत चाहने और हाथ-पैर मारने के बाद भी ऐसे लोग अपना जीवन-यापन का स्तर नहीं सुधार पाते। क्या हम किसी सरल तरीके से सरकार के काम में हाथ बटा कर उनकी मदद नहीँ कर सकते, जरा सोचिए।
मेरे पास एक आइडिया है जो गरीब भारतियों के लिए है

09 मार्च, 2011

सत्यापन, अपने ही कैरेक्टर का

वाह! खूब है सरकारी तंत्र और उसकी कार्यप्रणालियाँ।
अब आप सोचेंगे कि मैं आज इतनी तारीफ़ों के पुल क्यों बांधे जा रहा हूँ। अब मुझे नहीँ मालूम की यहाँ की कार्यप्रणाली की तरह पूरे देश की कार्यप्रणाली है या सिर्फ 'उत्तम प्रदेश' में ही ऐसा होता है?
अब आप पूछेंगे कि हुआ क्या है?
यार हुआ कुछ नहीँ बस इस सरकारी तंत्र की तारीफ में कसीदे करने का मन हुआ।
अब आप पूछेंगे कि ऊपर लिखा 'सत्यापन' का क्या चक्कर है? जी हाँ वही तो मैँ कहना चाहता हूँ कि आज के हाईटेक युग मेँ हमारी सरकार की यह कार्यप्रणालियाँ मेरे जैसे भारतवासियों को तो एकदम समझ मेँ नहीँ आती।
अब आप ही बताओ? मुझे एक कार्य के सिलसिले में शहर के जिलाधिकारी से सत्यापित चरित्र प्रमाणपत्र की आवश्यकता पड़ गयी अब उसे बनवाने में मुझे जो दिन में तारें दिखलायी पड़ने लगे

08 मार्च, 2011

टेलिपोर्टेशन और मैँ

आज से करीब 20-25 साल पहले मैंने अपने ब्लैक & व्हाइट टी.वी पर एक साइंस फिक्शन इंगलिश सीरियल 'स्टारट्रैक' देखा था, जो रविवार को आता था। वो सीरियल मुझे बहुत पसंद था।
उस सीरियल की एक खास बात जो मुझे बहुत पसंद थी वो ये की सीरियल के पात्र कैप्टन किर्क, स्पोक  और डॉ॰ मैककॉय जब कहीं अन्तरिक्ष में आते-जाते थे तो गायब हो कर वहाँ अवतरित हो जाते थे, वो तो मैँने बहुत दिनों बाद जाना कि उस क्रिया को 'टेलिपोट्रेशन' कहते हैँ। जिसकी मदद से किसी भी जीते-जागते इंसान को कहीँ भी भेजा जा सकता है। फिर मैँने पढ़ा की इस तकनीकी पर काफी रिसर्च चल रही है। और अब इस रोमांचक कल्पना के हक़ीकत में बदलने के आसार बढ़ गए लगते है। वैज्ञानिकों की रिसर्च कहाँ तक आ पहुँची है आइए कुछ इसके बारे में भी पता करते हैं:- ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने टेलीपोर्टेशन यानि किसी चीज़ को एक जगह ग़ायब कर किसी दूसरे स्थान उसका हूबहू प्रतिरूप उत्पन्न करने में सफलता हासिल की है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक एक प्रकाश पुँज को एक जगह ग़ायब कर कुछ दूरी पर उसे फिर से पाने में सफल रहे हैं। इस प्रयोग से इतना तो ज़ाहिर हो ही गया है, कि कम से कम सिद्धान्त: टेलीपोर्टेशन संभव है। उप परमाण्विक यानि परमाणु से भी छोटे कणों के मामले में  टेलीपोर्टेशन की संभावना काफ़ी ज़्यादा है। इससे आगे यानि परमाणु स्तर पर  टेलीपोर्टेशन कब संभव हो पाता है। यह देखने वाली बात होगी। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि छोटे स्तर पर ही सही, यदि  टेलीपोर्टेशन व्यावहारिक साबित हुआ तो इसके दूरसंचार के क्षेत्र में काफ़ी उपयोग हो सकेंगे।
क्या है टेलीपोर्टेशन?
'टेलीपोर्टेशन' विज्ञान गल्प के लेखकों द्वारा गढ़ा एक शब्द है. यह 'टेलीकम्युनिकेशन' और 'ट्रांसपोर्टेशन' शब्दों के मेल से बना है. यानि टेलीपोर्टेशन का मतलब हुआ दूरसंचार माध्यमों के ज़रिए परिवहन। भौतिकविदों, ख़ास कर क्वांटम मैकेनिक्स यानि पदार्थों की मूल संरचना पर अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों के लिए टेलीपोर्टेशन एक चुनौती भरा विषय रहा है। पहली बार 1998 में कैलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में एक अनुसंधान में यह बात सामने आई कि टेलीपोर्टेशन यानि किसी तत्व को मूल कणों में तोड़ कर वापस कहीं और उसका हूबहू प्रतिरूप उत्पन्न करना संभव है।
इस घोषणा के बाद दुनिया भर की कोई 40 प्रयोगशालाओं में टेलीपोर्टेशन पर गंभीरता से काम शुरू हुआ। ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में 'क्वांटम इंटैंग्लमैंट' नामक अवधारणा का उपयोग किया। क्वांटम इंटैंग्लमैंट की अवधारणा का उपयोग करते हुए ऑस्ट्रेलियाई भौतिकविद पिंग कोय लैम ने एक ऑप्टिकल संचार तंत्र के एक सिरे पर लेज़र प्रकाश को मूल कणों में तोड़ कर उसे एक मीटर दूर फिर से जोड़ने में सफलता पाई। प्रयोग के बारे में लैम ने कहा, "हमने ये दिखाया कि भारी तादाद में प्रकाश के वाहक ऊर्जा कणों यानि फ़ोटॉन को किसी एक जगह नष्ट कर, कहीं और उन्हें पाना बिल्कुल संभव है।"

ह्यूमन  टेलीपोर्टेशन
क्या अंतत: टेलीपोर्टेशन विज्ञान गल्पों के उस रोमांचक दृश्य को सही साबित कर पाएगा जिसमें कि किसी व्यक्ति को एक जगह मूल भौतिक कणों में तोड़ कर सारी सूचनाएँ सैंकड़ो किलोमीटर दूर पहुँचाई जाती है, जहाँ उन सूचनाओं के आधार पर उस व्यक्ति की हूबहू प्रतिकृति उत्पन्न की जाती है?
ये तो भविष्य ही बताएगा कि अंतत: टेलीपोर्टेशन किस हद तक जाता है, लेकिन लैम को भरोसा है कि भविष्य में दूरसंचार के क्षेत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने कहा कि क्वांटम टेलीपोर्टेशन ने कूटबद्ध संदेशों को शतप्रतिशत सुरक्षित बनाया जा सकेगा। मानव के टेलीपोर्टेशन के बारे में पूछे जाने पर लैम ने कहा कि इसके लिए ऐसे मशीनों के निर्माण की ज़रूरत होगी जो कि मानव शरीर में शामिल अरबों ख़रबों की संख्या में परमाणुओं का सटीक विश्लेषण कर सके।
उन्होंने कहा, "मैं समझता हूँ इस तरह का टेलीपोर्टेशन बहुत-बहुत दूर की बात है. अभी तो स्थिति ये है कि हम एक परमाणु तक को टेलीपोर्ट करने की विधि नहीं जान पाए हैं।"
ह्यूमैन टेलीपोर्टेशन की बात करते समय हमें यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि संभव दिख रहे क्वांटम टेलीपोर्टेशन में मूल फ़ोटॉन कण नष्ट हो जाते हैं और उनकी प्रतिकृति मात्र ही दूसरी जगह उपलब्ध हो पाती है।


06 मार्च, 2011

वैज्ञानिकोँ ने तैयार किया महिला रोबोट

जर्मनी के वैज्ञानिकोँ ने एक महिला रोबोट तैयार किया है। इसके बारे मेँ उनका दावा है कि माडॅल जैसे अपने नैन-नक्श के बावजूद यह कारखानोँ मेँ काम करने के लिए सबसे बेहतर साबित हो सकता है। इसे बनाने वाले वैज्ञानिकोँ का कहना है कि उच्च तकनीकी से लैस आर्टिफिशियल इंटलीजेँस लाइटवेट एंड्रोइड रोबोट को फेमबोट नाम दिया गया है। यह न सिर्फ मार्गदर्शन कर सकता है, बल्कि अपने लिए सोच भी सकता है और भारी वस्तुओँ को उठा सकता है। इस रोबोट के लम्बे बाल भी है। 'सन' अखबार की ख़बर के मुताबिक जर्मनी के सीईबिट प्रौद्दोगिक मेले मेँ इस रोबोट का अनावरण किया गया।

01 मार्च, 2011

आंकड़े बोलते हैं...

अमेरिका स्थित पिऊ रिसर्च सेंटर की हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में 1 बिलियन और 570 मिलियन मुसलमान हैं। मतलब दुनिया का हर चौथा आदमी मुसलमान है। दुनिया की चौथाई आबादी होने के बाद भी आज मुसलमान वैज्ञानिक-तकनीकी तौर पर पिछड़े हैं, राजनीतिक रूप से भी हाशिये पर हैं और आर्थिक रूप से बहुत ग़रीब। ऐसा क्यों है? विश्व के सकल घरेलू उत्पाद, जो 60 ट्रिलियन डॉलर है, में मुसलमानों की भागीदारी केवल 3 ट्रिलियन डॉलर है, जो फ्रांस जैसे छोटे देश, जिसकी जनसंख्या 70 मिलियन है, से भी कम है और जापान के सकल घरेलू उत्पाद की आधी है तथा अमेरिका, जिसकी जनसंख्या 300 मिलियन है, के सकल घरेलू उत्पाद का पांचवा हिस्सा है। ऐसा क्यों? यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि विश्व की 35 फ़ीसदी जनसंख्या ईसाई है, लेकिन यही 35 फ़ीसदी लोग विश्व की 70 फ़ीसदी धन-संपत्ति के मालिक हैं।
     मानव विकास सूचकांक यानि एच॰डी॰आई॰ में भी यदि कुछ तेल निर्यात करने वाले देशों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी मुसलमान देश बहुत नीचे आते हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी मुसलमान देश बहुत पीछे हैं। विज्ञान के क्षेत्र में बस 500 शोधपत्र यानि पी॰एच॰डी जमा होते हैं। यह संख्या अकेले इंग्लैंड में 3000 है। 1901 से लेकर 2008 तक लगभग 500 नोबल पुरस्कारों में से यहूदियों को 140 बार यह पुरस्कार पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो लगभग 25 फ़ीसदी है। जबकि यहूदियों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की केवल 0.2 फ़ीसदी है। इसके विपरीत आज तक मात्र एक मुसलमान को यह पुरस्कार पाने का अवसर मिला है। (एक और भी था, लेकिन पाकिस्तान ने उसे गैर मुसलमान घोषित कर दिया) मतलब यह की मुसलमानों की इस पुरस्कार में भागीदारी 0.2 फ़ीसदी है यानि विज्ञान के क्षेत्र में मुसलमानों का योगदान नगण्य है। एक और नकारात्मक तथ्य निकल कर आया, शंघाई विश्वविध्यालय द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के आधार पर, इसमें विश्व के 400 सबसे बढ़ियाँ विश्वविध्यालय की एक सूची है और इस्लामी देशों का एक भी विश्वविध्यालय इस सूची में नहीं हैं। यह बड़ी दुःखद बात है, क्योंकि 7वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक दुनिया के सबसे बड़े और आलिम विश्वविध्यालय मुस्लिम देशों में स्थित थे। कोरडोबा, बग़दाद और काइरो इस्लामिक तालिम के नामचीन केंद्र थे।
     विज्ञान के जाने-माने इतिहासकार जिलेस्पी ने ऐसे 130 महान वैज्ञानिकों एंव और प्रौद्योगिक विशेषज्ञों की सूची बनाई है, जिनका मध्ययुग में बहुत बड़ा योगदान था इनमें से 120 ऐसे थे, जो मुसलमान देशों से थे और केवल 4 यूरोप से थे। क्या यह तथ्य ख़ुद में इतना अर्थपूर्ण नहीं की मुसलमान अपने भूत को विवेचित करें, अपने आज को ईमानदारी से देखें और अपने भविष्य की तार्किक रूप से कल्पना करें। मैं मुसलमानों की इस आबादी के बारे में कुछ और रोचक तथ्य बता सकता हूँ, जो अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किए गए शोधों पर आधारित हैं। आज की प्रजनन रफ्तार से मुसलमानों की जनसंख्या अगले 500 सालों में दोगुनी हो जाएगी। तब मुसलमान संख्या में ईसाईयों से अधिक हो जाएंगे, जिनकी जनसंख्या भी दोगुनी होगी। मतलब यह की मुसलमानों की समस्याएँ और बढ़ जाएंगी। आज की बेरोजगारी और आर्थिक ग़रीबी, जो मुस्लिम समाज और मुस्लिम देशों में व्याप्त है। वह ज़ाहिर तौर पर और बढ़ेगी। अगले 50 सालों में अगर मुस्लिम जनसंख्या बढ़कर दोगुनी हो गई तो मुसलमान और ईसाई देशों के बीच आर्थिक विकास की दूरी और बढ़ेगी। प्रश्न फिर यह उठता है कि इस शताब्दी या आने वाली सदी में विश्व पर किसकी सार्वभौमिकता और प्रभुसत्ता रहेगी, 5 फीसदी संसाधन वाले मुसलमानों कि या 70 फीसदी संसाधन वाले ईसाइयों की?
     मुसलमानों को यह याद रखने की जरूरत है कि आज के वैज्ञानिक विकास से परिभाषित विश्व में किसी भी देश की इज्ज़त और शक्ति उसकी जनसंख्या पर आधारित नहीं है। आज के विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ही शक्ति, इज्ज़त और संसाधनो की गारंटी है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां अधिक जनसंख्या के साथ आर्थिक पिछड़ापन और कम सामरिक सामर्थ्य है। यहूदी देश इज़राइल को देखिए, इतना छोटा देश पूरे अरब पर हावी रहता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह एक आर्थिक, सामरिक और वैज्ञानिक रूप से समृद्ध देश है, जिसके सामने पिछड़ेपन के शिकार अरब देशों को झुकना पड़ता है, हार मान लेनी पड़ती है। एक तरफ वे मुसलमान हैं, जो आज पश्चिमी देशों में रहते हैं और अपनी समृद्धि से खुश हैं। जबकि वहीं वे मुसलमान भी हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य देशों के बाशिंदे हैं और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन में डूबे हुए हैं। यूरोप में रहने वाले 20 मिलियन मुसलमानों का सकल घरेलू उत्पाद पूरे भारतीय महाद्वीप के 500 मिलियन मुसलमानों से अधिक है।
     निस्सीम हसन एक ख्याति प्राप्त इस्लामिक विद्वान हैं। वह कहते हैं कि मुसलमानों में ज्ञानार्जन की घटती प्रवृत्ति ही उनके आर्थिक और राजनीतिक पन का मुख्य कारण है। हमने सदियों से मानवता का नेतृत्व छोड़ दिया है। हम लकीर के फ़कीर बन कर रह गए हैं। महातिर मोहम्मद, जो मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री हैं, ने मुसलमानों को सही सलाह दी। उन्होने ओ॰आई॰सी॰ की मीटिंग में कहा की मुसलमानों को अपनी रूढ़िवादिता छोड़कर नए समय में नई पहचान बनानी चाहिए, क्योंकि सामाजिक परिस्थितियाँ अब बदल चुकी हैं। यह याद रखने की बात है की 8वीं से 14वीं शताब्दी के बीच जब मुसलमान स्पेन पर राज करते थे, तब स्पेन की आमनी बाकी सारे यूरोप से धिक थी। ऐसा इसलिए था, क्योंकि स्पेन तब उच्च शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। आज स्थिति उलट-पलट हो गई है। आज ईसाई स्पेन का सकल घरेलू उत्पादन विश्व के 12 तेल निर्यात करने वाले मुस्लिम देशों से कहीं अधिक है। मुस्लिम शासन के दौरान सभी देशों का इतना ही अच्छा हाल था। बग़दाद,मास्कस, काहिरा एंव त्रिपोली अपनी वैज्ञानिक दूरदृष्टि के लिए विख्यात थे। इन मध्ययुगीन शताब्दियों में मुस्लिम देशों को आर्थिक, सांस्कृतिक एंव बौद्धिक रूप से बहुत विकसित माना जाता था। इसके विपरीत डोनाल्ड कैम्बेल (सर्जन-फ्रांस) के अनुसार, जब मुस्लिम देशों में विज्ञान की आँधी चल रही थी, तब यूरोप अंधकार में जी रहा था, जब इस्लाम का उद्भव हो रहा था और वह संसार पर हावी हो रहा था, तब मुसलमानों की जनसंख्या बमुश्किल 10 फ़ीसदी थी।

डॉ एम॰आई॰एच फारुखी
(लेखक एन॰बी॰आर॰आई॰ के अवकाश प्राप्त वैज्ञानिक हैं)
संकलन: dharmendra61
सौजन्य: चौथी दुनिया