04 दिसंबर, 2011

वाय दिस कोलावेरी डी

आने वाली तमिल फिल्म 3 के लिए बिना किसी योजना के तहत तमिल और अंग्रेजी शब्दों को मिला कर बने गाने 'कोलावेरी डी' ने इस इंटरनेट जगत पर धूम मचा रखी है।

23 नवंबर, 2011

ग्राफ़िक SMS

ग्राफ़िक SMS को Picture SMS के भी नाम से जाना जाता है। जोकि SMS से कहीं अधिक आकर्षक होते हैं। ये मैसेज Computer आर्ट होते हैं। जिन्हें ASCII (American Standard Code for Information Interchange) आर्ट के नाम से भी जाना जाता है।

17 नवंबर, 2011

अब सबके लिए आया ‘गूगल म्यूजिक’

इंटरनेट की दुनिया में रोज कुछ न कुछ बदलाव देखने को मिलता रहता है। लेकिन इन बदलाव को वही महसूस कर पाते है जो इंटरनेट प्रेमी कहे जाते है। जी हाँ इन्हीं बदलाव में अपनी बादशाहत बरकरार रखने के लिए दुनिया का नंबर वन सर्च इंजन गूगल संगीत प्रेमियों के लिए एक नई सौगात लेकर आ रहा है।

13 नवंबर, 2011

अब मोबाइल के ज़रिये करें तेज़ी से डाउनलोड


Mobile Internet Softwere तकनीक उपलब्ध कराने वाली कंपनी UC Web ने अपना आधुनिक वेब Browser UCWeb 8.0 वर्ज़न बाज़ार में उतारा है। इसके ज़रिये Mobile पर Deta को तेज़ी से Download किया जा सकता है।

01 नवंबर, 2011

सोना - कुछ तथ्य

Gold
  • सोना दुनिया की इकलौती ऐसी धातु है, जिसकी उम्र पत्थर और पहाड़ से भी ज्यादा है। बुल्गारिया में पुरातत्वविदों को मिले एक गहने से पता चला है कि वह 4000 बीसी पुराना है। यह उम्र एक पत्थर की उम्र से ज्यादा है।
  • दुनिया के महासागरों में लगभग एक सौ मिलियन टन सोना पड़ा हुआ है। लेकिन अफसोस अब तक उसे निकालने की कोई सस्ती विधि नहीं ढूँढी जा सकी है।
  • एक औंस सोने को एक इंच के 50 लाखवें भाग जितना फैलाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में एक ऑन्स सोने को 50 मील की दूरी तक फैलाया जा सकता है।

27 अक्तूबर, 2011

टैली - एक अलग नज़रिया

टैली को तो जानते ही होंगे आप? जी हाँ मैं उसी मशहूर एकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के बारे में बात कर रहा हूँ जिसने आज छोटे-बड़े सभी व्यापारियों को अपने बहीखातों व मोटे-मोटे लेजरबुकों को लैपटॉप और डेस्कटॉप में बदलने के लिए मजबूर कर दिया हैं।

26 अक्तूबर, 2011

Happy दीपावली

शुभ दीपावली

हमारे सभी पाठकों और यहाँ तक आने वाले सभी नव आगंतुकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ और सुखमय जीवन की बधाई

21 अक्तूबर, 2011

जल्द आने वाली है ‘वंडर पिल’

जी हाँ अब एक ऐसी वंडर पिल को बनाने में जुटे हैं न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी- सिडनी आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक प्रोफेसर पीटर स्मिथ और उनकी टीम। प्रोफेसर साहब और उनकी टीम का दावा है, ज़िंदगी की पिच पर शतक माने की लोगों की चाहत वे बहुत जल्दी पूरी करने वाले हैं। और आने वाले सिर्फ पाँच सालों में ऐसी अनोखी वंडर पिल उपलब्ध होगी जिसके सेवन से 150 सालों तक जीने की क्षमता हासिल हो सकती है। वो भी बीमारियों से लड़े बगैर।

17 अक्तूबर, 2011

C++ प्रोग्रामिंग के जनक भी नहीं रहे

Dennis Ritchie
जी हाँ यह महीना बहुत ही Depressed करने वाला रहा है। Steve Jobs के बाद अब 70 वर्षीय Dennis Ritchie भी चले गए। रिची जिन्होने 1970 के दशक में हमारे कम्प्युटर को C++ जैसी भाषा से अवगत कराया था, का विगत दिनों उनके निवास पर निधन हो गया। कम्प्युटर की अति लोकप्रिय सी प्रोग्रामिंग भाषा लिखने वाले कम्प्युटर महारथी डेनिस रिची अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उन्होने यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के विकास में जो महत्वपूर्ण योगदान दिया है उससे हम लोग हमेशा लाभान्वित होते रहेंगे।
रिची को बर्कले हाइट्स, न्यू जर्सी स्थित उनके घर में मृत पाया गया। Dennis Ritchie के भाई बिल ने मीडिया को बताया कि प्रोस्टेट कैंसर के इलाज़ के बाद बीते कुछ वर्ष में रिची का स्वास्थ्य खराब रहता था और वे अकेले रह रहे थे। रिची ने 70 के दशक में C प्रोग्रामिंग भाषा का विकास किया, जो आज भी लोकप्रिय है।

15 सितंबर, 2011

सौरऊर्जा से चलने वाली कम्प्युटर चिप - इंटेल



दुनिया की सबसे बड़ी चिप निर्माता कंपनी इंटेल कार्पोरेशन के प्रमुख पॉल ओटेलिनी ने इंटेल डेवलपर फोरम 2011 को संबोधित करते हुए एक ऐसे कम्प्युटर को प्रस्तुत किया, जो भविष्य में भारत जैसे देशों में कम्प्युटर के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। विद्युत ऊर्जा की कमी से जूझते इस जैसे अन्य देशों के लिए इंटेल ने जिस नए कम्प्युटर का अनावरण किया है। वो सौरऊर्जा से चलने वाली एक डाक टिकट के आकार के चिप से चलता है। कम्प्युटर चलाने के लिए बिजली की खपत को कम करने की कोशिशों का जिक्र करते हुए पॉल ने बताया कि इंटेल कार्पोरेशन भविष्य की कई तकनीकों पर काम कर रही जिससे अगले दस सालों में कम्प्युटरों की बिजली क्षमता 300 गुना तक सुधर जाएगी।

10 सितंबर, 2011

सोनी का दोहरा स्क्रीन टैब

अव्वल कंपनी में शुमार सोनी ने पिछले दिनों दुनिया में अब तक का पहला दोहरी स्क्रीन क्षमता वाला अपना टैबलेट कम्प्युटर लांच किया। समाचार पत्र हिंदुस्तान’ में छपी उस खबर को मैने यहाँ अपने पाठको के लिए सँजो दिया हमेशा के लिए, पेश है वो कटिंग। पढ़िये और दूसरों को भी बताइये। और मेरी यह कोशिश आपको कैसी लगी? मुझे भी बताना न भूलिएगा

09 सितंबर, 2011

क्यू॰ आर॰ कोड

आपने अक्सर पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापनों में देखा होगा एक छोटा सा चौकोर चित्र जिसमें अजीब सी लाइनें और ढेर सारे बिंदु बने रहते हैं और उसके बगल या नीचे लिखा रहता है अपने मोबाइल के कैमरे से इसकी फोटो लें।
इसी को बोलते हैं क्यू॰ आर॰ कोड यानि क्लिक रिस्पॉन्स कोड यह कोड बारकोड’ जैसा ही होता है। इसकी एक जानकारी समाचार पत्र हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुई थी। इसे मैंने आपके लिए यहाँ संकलित कर दिया है। आशा हैं यह जानकारी आपको पसंद आएगी।

07 अगस्त, 2011

नेट फ्रमवर्क

माइक्रोसॉफ्ट फ़्रमवर्क डाउनलोड

नेट फ्रमवर्क डाउनलोड करना अब बेहद आसान।

06 अगस्त, 2011

जानिए 'जूनो' को भी

जूनो जानते हैं इस नाम को? नहीं ना, जूनो नाम है उस खोजी अन्तरिक्ष यान का जो आज निकल पड़ेगा हमारे सौरमण्डल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति को और नजदीक से जानने के लिए। अपने साथ तीन छोटी मूर्तियों को भी लेकर।

14 जून, 2011

आंतक के कुछ दिलचस्प तथ्य

जिस आंतक के आका लादेन को अमेरिका ने अपनी सीक्रेट सर्विस सी॰आई॰ए॰ के माध्यम से अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ की लाल सेना को परास्त करने के लिए आई॰एस॰आई की मदद से खड़ा किया, उसी ने अमेरिका में घुसकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की धज्जियां बिखेर दीं। और जिस पाकिस्तान ने अपनी सरजमीं पर उसे पनाह दी, वह वहीं मारा गया। बेनज़ीर भुट्टो, जिनके प्रधानमंत्रित्वकाल मेँ तालिबान और अन्य कट्टरपंथी संगठन फले-फूले, वही उनकी मौत की वजह बने। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने जिस मोहाजिर परवेज़ मुशर्रफ़ को कमज़ोर समझ कर सेना की कमान सौंपी, उसी मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ का तख्ता पलट कर दिया। जिस परवेज़ मुशर्रफ ने खूंखार आतंकवादी इलियास कश्मीरी को सम्मानित किया, उसी के संगठन ने मुशर्रफ़ को जान से मारने की नाकाम साजिश रची।

29 मई, 2011

मनुष्य बन जाएगा मशीन

हम अपने निकट अतीत पर नज़र डालें, तो पाते हैं कि तकरीबन 8,000 वर्ष पहले मानवता ने कृषि क्रांति का दीदार किया था और करीब 150 वर्ष पहले औद्योगिक क्रांति का। भले ही इन दोनों के बीच एक लंबा अंतराल रहा हो, लेकिन अगले 90 वर्षो में प्रोद्योगिकीय विकास की गति तीव्र से तीव्रतर होती गई। इसकी एक झलक हमें कम्प्युटर के विकास क्रम से भी मिलती है, जिसका आरंभिक स्वरूप (1900-1920) जहां मात्र 'संगणको' का था, वह अब आधुनिक सुपर कम्प्युटर तक आ पहुंचा है।

23 मई, 2011

मस्तिष्क का बनेगा कम्प्युटर मॉडल


ब्राह्मणॉ की साजिश

साढ़े तीन प्रतिशत कथित विदेशी आर्य ब्राह्मणॉ ने भारत के मूल निवासी 85 प्रतिशत दलित पिछड़ॉ व अल्पसंख्यकॉ के हक पर कब्जा जमाया है।

21 मई, 2011

एक सपना जो शायद सच हो

अभी कुछ देर पहले सो कर उठा हूँ, ब्रश करने के बाद चाय पी रहा था तभी याद आया कि मैं तो कोई सपना देख कर उठा हूँ। याद करने लगा की क्या देखा था? सारे बिखरे हुए चलचित्रों की मानिंद घटनाओँ की तस्वीरों को जोड़ता हुआ यहाँ आ गया जल्दी से कुछ लिखने ताकि भूल न जाऊँ।

19 मई, 2011

ग्लेसे 581_d पर हो सकता है जीवन


वैज्ञानिको को सौर मण्डल के बाहर 20 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित एक लाल रंग के छोटे ग्रह का पता चला है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस पर जीवन हो सकता है शोधकर्ताओँ के अनुसार ग्लेसे 581_d गोल्डीलाक्स जोन के सबसे ठंडे सीमाई क्षेत्र पर स्थित है।

17 मई, 2011

एक नजरिया

गौतम बुद्ध धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके साथ श्रद्धा और आस्था की जरूरत नहीं है। उनके साथ तो समझ पर्याप्त है। अगर तुम समझने को राज़ी हो तो तुम बुद्ध की नौका में सवार हो जाओगे। अगर श्रद्धा भी आएगी तो समझ की छाया होगी। लेकिन समझ के पहले श्रद्धा की मांग बुद्ध की नहीं है। बुद्ध यह नहीं कहते कि जो मैं कहता हूँ, भरोसा कर लो। वह सोचने, विचारने और जीने पर जोर देते हैं।

विशाल दूरबीन खोजेगी एलियन्स


मौत के बाद जीवन जैसा कुछ नहीं : हॉकिंग

मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कहा है कि मौत के बाद जीवन या स्वर्ग-नर्क जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीँ है। उन्होने कहा है कि ऐसी अवधारणाएं परियों के किस्से-कहानियों की तरह हैं और ये उन लोगों के लिए है, जो मौत से डरते हैँ। 'द गार्डियन' को दिए गये साक्षात्कार में 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' के लेखक ने कहा कि जब मस्तिष्क अपने आखिरी समय में होता है तो उसके बाद ऐसा कुछ नहीँ होता। हॉकिंग 21 साल की उम्र से ही मोटर न्यूरान बीमारी का इलाज करा रहे हैं। उन्होने कहा, मैं पिछले 49 सालो से जल्द मरने की संभावना के साथ जी रहा हूं, लेकिन मुझे मरने की कोई जल्दबाजी नहीं हैं।

और अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें:  The Guardian: Stephen Hawking: 'There is no heaven; it's a fairy story'

06 मई, 2011

पृथ्वी की ओर बढ़ती तबाही

साढ़े 5 करोड़ टन वजनी एक विशालकाय उल्कापिंड पृथ्वी की ओर तेजी से बढ़ रहा है, लगभग चौथाई मील की यह चट्टान इस साल नवंबर में पृथ्वी और चांद के बीच से गुजरने वाली है, अब देखिए क्या होता है?

28 अप्रैल, 2011

आंतक की पाठशाला

1.मॉन्ट्रियल(कनाडा)-अल सुन्ना मस्जिद
2.कराची(पाकिस्तान)-अबू बक्र अंतरराष्ट्रीय विश्वविधालय
3.काबुल अफगानिस्तान)-वजीर अकबर खान मस्जिद
4.सादाह(यमन)-दिमाज संस्थान
5.लंदन(ब्रिटेन)-फिन्सबरी पार्क मस्जिद
6.मिलान(इटली)- इस्लामी सांस्कृतिक संस्थान की मस्जिद
7.लेयॉन(फ्रांस)-लेनेक मस्जिद

21 अप्रैल, 2011

क्या है एंटीऑक्सीडेँट?

एंटीऑक्सीडेंट ऐसे रासायनिक पदार्थ होते है जो ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया को रोकते हैँ। ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया मेँ किसी पदार्थ से इलेक्ट्रॉन निकलकर ऑक्सीडाइजिँग एजेँट तक पहुंचता है। वस्तुत: ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया मेँ स्वतंत्र कण उत्पन्न होते हैँ और यह प्रक्रिया सतत् प्रतिक्रिया (चेन रिएक्शन) मेँ बदल जाती है। इस प्रतिक्रिया से खतरा यह है कि शरीर की जिस कोशिका मेँ यह कि शरीर की जिस कोशिका मेँ यह सतत् प्रतिक्रिया शुरु हो जाती है उसके क्षतिग्रस्त होने या खत्म होने का खतरा बढ़ जाता है। एंटीऑक्सीडेँट ऑक्सीडेशन की प्रक्रिया को रोककर  ऐसे खतरोँ से निजात दिलाने मेँ सहायक है।

14 मार्च, 2011

चाँद – एक वैज्ञानिक पक्ष


लगभग सभी लोग यह जानते हैं कि चन्द्रमा हमारी पृथ्वी के गिर्द परिभ्रमण करता है। हमारे सौरमण्डल के अन्य ग्रहों कि अपेक्षा चन्द्रमा पृथ्वी के काफी समीप है यानि महज़ 2 लाख 40 हज़ार मील के फासले पर।
      चाँद के निर्माण के बारे में जो सबसे मशहूर अनुमान हैं, उसके अनुसार चाँद का  जन्म साढ़े चार अरब वर्ष पूर्व उस समय हुआ थाजब थीया नामक मंगल ग्रह के आकार के एक पिंड की टक्कर पृथ्वी से हुई थी। इस टक्कर के बाद खरबों टन का मैग्मा और पत्थर पृथ्वी की कक्षा में पहुंचा था जो ठंडा होकर चाँद बना था। हालांकि यह सिद्धांत पूर्ण नहीं है क्योंकि इसके अनुसार पृथ्वी पर किसी समय मैग्मा का महासागर थालेकिन ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। इसके बावजूदचाँद के निर्माण की प्रक्रिया यह सिद्धांत अन्य किसी की अपेक्षा बेहतर तरीके से समझाता है।
सौरमंडल के निर्माण के समय जब ग्रहों की सरंचना चल रही थीयह स्थान बेहद भीड़ भरा था। ग्रहों की कक्षाएं अपना स्थान ले रही थी और कई एस्टरॉयड इधर-उधर उड़ रहे थे। एक अपेक्षाकृत स्थिर आकाशीय चट्टान L5 की पृथ्वी के साथ विशेष घनिष्ठता थी। पृथ्वी की कक्षा में लेकिन उससे अलग अस्तित्व बनाए रखने वाला L5 आधुनिक ट्रोजन उल्काओं का घर भी है। L5 का पिंड आकार धीर-धीरे बढ़ने पर यह अस्थिर होने लगा था। जल्दी ही इसके दोलने से यह पृथ्वी से टकराया। इस टक्कर से छिटक कर हटा पदार्थ ही कालांतर में चाँद के तौर पर सामने आया जो शुरुआत में महासागरों से अटा था जिनके प्रमाण अपोलो यान के एस्ट्रोनॉट्स को मिले हैं।
अपने अपेक्षतया बड़े आकार की पृथ्वी के गिर्द चक्कर काटने वाला चाँद पृथ्वी के लिए कई मायनों में जरूरी कार्य भी करता है। हैरानी की बात यह है कि पृथ्वी के ही समान आकार के शुक्र का कोई उपग्रह नहीं है। एक अन्य समान आकार ग्रह मंगल के उपग्रह बेहद छोटे हैं जो औसतन 20 किलोमीटर अर्द्धव्यास के हैं। इस दृष्टि से चाँद सौर मंडल के सबसे बड़े उपग्रहों में से एक है। चाँद के अस्तित्व में आने के पीछे के सिद्धांत के बारे में एक अनुमान यह भी है कि उसकी सतह पृथ्वी से मिलती-जुलती है। इसके बारे में वैज्ञानिकों ने कई चंद्र अभियानों के बाद ही ‘महाटक्कर’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।

12 मार्च, 2011

गरीबों की भी सुनो...

मैं अक्सर सोचा करता हूँ कि हमारे देश में आज भी कितने लोग एक दिन का राशन नहीं जुटा पाते, बहुत चाहने और हाथ-पैर मारने के बाद भी ऐसे लोग अपना जीवन-यापन का स्तर नहीं सुधार पाते। क्या हम किसी सरल तरीके से सरकार के काम में हाथ बटा कर उनकी मदद नहीँ कर सकते, जरा सोचिए।
मेरे पास एक आइडिया है जो गरीब भारतियों के लिए है

09 मार्च, 2011

सत्यापन, अपने ही कैरेक्टर का

वाह! खूब है सरकारी तंत्र और उसकी कार्यप्रणालियाँ।
अब आप सोचेंगे कि मैं आज इतनी तारीफ़ों के पुल क्यों बांधे जा रहा हूँ। अब मुझे नहीँ मालूम की यहाँ की कार्यप्रणाली की तरह पूरे देश की कार्यप्रणाली है या सिर्फ 'उत्तम प्रदेश' में ही ऐसा होता है?
अब आप पूछेंगे कि हुआ क्या है?
यार हुआ कुछ नहीँ बस इस सरकारी तंत्र की तारीफ में कसीदे करने का मन हुआ।
अब आप पूछेंगे कि ऊपर लिखा 'सत्यापन' का क्या चक्कर है? जी हाँ वही तो मैँ कहना चाहता हूँ कि आज के हाईटेक युग मेँ हमारी सरकार की यह कार्यप्रणालियाँ मेरे जैसे भारतवासियों को तो एकदम समझ मेँ नहीँ आती।
अब आप ही बताओ? मुझे एक कार्य के सिलसिले में शहर के जिलाधिकारी से सत्यापित चरित्र प्रमाणपत्र की आवश्यकता पड़ गयी अब उसे बनवाने में मुझे जो दिन में तारें दिखलायी पड़ने लगे

08 मार्च, 2011

टेलिपोर्टेशन और मैँ

आज से करीब 20-25 साल पहले मैंने अपने ब्लैक & व्हाइट टी.वी पर एक साइंस फिक्शन इंगलिश सीरियल 'स्टारट्रैक' देखा था, जो रविवार को आता था। वो सीरियल मुझे बहुत पसंद था।
उस सीरियल की एक खास बात जो मुझे बहुत पसंद थी वो ये की सीरियल के पात्र कैप्टन किर्क, स्पोक  और डॉ॰ मैककॉय जब कहीं अन्तरिक्ष में आते-जाते थे तो गायब हो कर वहाँ अवतरित हो जाते थे, वो तो मैँने बहुत दिनों बाद जाना कि उस क्रिया को 'टेलिपोट्रेशन' कहते हैँ। जिसकी मदद से किसी भी जीते-जागते इंसान को कहीँ भी भेजा जा सकता है। फिर मैँने पढ़ा की इस तकनीकी पर काफी रिसर्च चल रही है। और अब इस रोमांचक कल्पना के हक़ीकत में बदलने के आसार बढ़ गए लगते है। वैज्ञानिकों की रिसर्च कहाँ तक आ पहुँची है आइए कुछ इसके बारे में भी पता करते हैं:- ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने टेलीपोर्टेशन यानि किसी चीज़ को एक जगह ग़ायब कर किसी दूसरे स्थान उसका हूबहू प्रतिरूप उत्पन्न करने में सफलता हासिल की है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक एक प्रकाश पुँज को एक जगह ग़ायब कर कुछ दूरी पर उसे फिर से पाने में सफल रहे हैं। इस प्रयोग से इतना तो ज़ाहिर हो ही गया है, कि कम से कम सिद्धान्त: टेलीपोर्टेशन संभव है। उप परमाण्विक यानि परमाणु से भी छोटे कणों के मामले में  टेलीपोर्टेशन की संभावना काफ़ी ज़्यादा है। इससे आगे यानि परमाणु स्तर पर  टेलीपोर्टेशन कब संभव हो पाता है। यह देखने वाली बात होगी। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि छोटे स्तर पर ही सही, यदि  टेलीपोर्टेशन व्यावहारिक साबित हुआ तो इसके दूरसंचार के क्षेत्र में काफ़ी उपयोग हो सकेंगे।
क्या है टेलीपोर्टेशन?
'टेलीपोर्टेशन' विज्ञान गल्प के लेखकों द्वारा गढ़ा एक शब्द है. यह 'टेलीकम्युनिकेशन' और 'ट्रांसपोर्टेशन' शब्दों के मेल से बना है. यानि टेलीपोर्टेशन का मतलब हुआ दूरसंचार माध्यमों के ज़रिए परिवहन। भौतिकविदों, ख़ास कर क्वांटम मैकेनिक्स यानि पदार्थों की मूल संरचना पर अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों के लिए टेलीपोर्टेशन एक चुनौती भरा विषय रहा है। पहली बार 1998 में कैलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में एक अनुसंधान में यह बात सामने आई कि टेलीपोर्टेशन यानि किसी तत्व को मूल कणों में तोड़ कर वापस कहीं और उसका हूबहू प्रतिरूप उत्पन्न करना संभव है।
इस घोषणा के बाद दुनिया भर की कोई 40 प्रयोगशालाओं में टेलीपोर्टेशन पर गंभीरता से काम शुरू हुआ। ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में 'क्वांटम इंटैंग्लमैंट' नामक अवधारणा का उपयोग किया। क्वांटम इंटैंग्लमैंट की अवधारणा का उपयोग करते हुए ऑस्ट्रेलियाई भौतिकविद पिंग कोय लैम ने एक ऑप्टिकल संचार तंत्र के एक सिरे पर लेज़र प्रकाश को मूल कणों में तोड़ कर उसे एक मीटर दूर फिर से जोड़ने में सफलता पाई। प्रयोग के बारे में लैम ने कहा, "हमने ये दिखाया कि भारी तादाद में प्रकाश के वाहक ऊर्जा कणों यानि फ़ोटॉन को किसी एक जगह नष्ट कर, कहीं और उन्हें पाना बिल्कुल संभव है।"

ह्यूमन  टेलीपोर्टेशन
क्या अंतत: टेलीपोर्टेशन विज्ञान गल्पों के उस रोमांचक दृश्य को सही साबित कर पाएगा जिसमें कि किसी व्यक्ति को एक जगह मूल भौतिक कणों में तोड़ कर सारी सूचनाएँ सैंकड़ो किलोमीटर दूर पहुँचाई जाती है, जहाँ उन सूचनाओं के आधार पर उस व्यक्ति की हूबहू प्रतिकृति उत्पन्न की जाती है?
ये तो भविष्य ही बताएगा कि अंतत: टेलीपोर्टेशन किस हद तक जाता है, लेकिन लैम को भरोसा है कि भविष्य में दूरसंचार के क्षेत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने कहा कि क्वांटम टेलीपोर्टेशन ने कूटबद्ध संदेशों को शतप्रतिशत सुरक्षित बनाया जा सकेगा। मानव के टेलीपोर्टेशन के बारे में पूछे जाने पर लैम ने कहा कि इसके लिए ऐसे मशीनों के निर्माण की ज़रूरत होगी जो कि मानव शरीर में शामिल अरबों ख़रबों की संख्या में परमाणुओं का सटीक विश्लेषण कर सके।
उन्होंने कहा, "मैं समझता हूँ इस तरह का टेलीपोर्टेशन बहुत-बहुत दूर की बात है. अभी तो स्थिति ये है कि हम एक परमाणु तक को टेलीपोर्ट करने की विधि नहीं जान पाए हैं।"
ह्यूमैन टेलीपोर्टेशन की बात करते समय हमें यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि संभव दिख रहे क्वांटम टेलीपोर्टेशन में मूल फ़ोटॉन कण नष्ट हो जाते हैं और उनकी प्रतिकृति मात्र ही दूसरी जगह उपलब्ध हो पाती है।


06 मार्च, 2011

वैज्ञानिकोँ ने तैयार किया महिला रोबोट

जर्मनी के वैज्ञानिकोँ ने एक महिला रोबोट तैयार किया है। इसके बारे मेँ उनका दावा है कि माडॅल जैसे अपने नैन-नक्श के बावजूद यह कारखानोँ मेँ काम करने के लिए सबसे बेहतर साबित हो सकता है। इसे बनाने वाले वैज्ञानिकोँ का कहना है कि उच्च तकनीकी से लैस आर्टिफिशियल इंटलीजेँस लाइटवेट एंड्रोइड रोबोट को फेमबोट नाम दिया गया है। यह न सिर्फ मार्गदर्शन कर सकता है, बल्कि अपने लिए सोच भी सकता है और भारी वस्तुओँ को उठा सकता है। इस रोबोट के लम्बे बाल भी है। 'सन' अखबार की ख़बर के मुताबिक जर्मनी के सीईबिट प्रौद्दोगिक मेले मेँ इस रोबोट का अनावरण किया गया।

01 मार्च, 2011

आंकड़े बोलते हैं...

अमेरिका स्थित पिऊ रिसर्च सेंटर की हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में 1 बिलियन और 570 मिलियन मुसलमान हैं। मतलब दुनिया का हर चौथा आदमी मुसलमान है। दुनिया की चौथाई आबादी होने के बाद भी आज मुसलमान वैज्ञानिक-तकनीकी तौर पर पिछड़े हैं, राजनीतिक रूप से भी हाशिये पर हैं और आर्थिक रूप से बहुत ग़रीब। ऐसा क्यों है? विश्व के सकल घरेलू उत्पाद, जो 60 ट्रिलियन डॉलर है, में मुसलमानों की भागीदारी केवल 3 ट्रिलियन डॉलर है, जो फ्रांस जैसे छोटे देश, जिसकी जनसंख्या 70 मिलियन है, से भी कम है और जापान के सकल घरेलू उत्पाद की आधी है तथा अमेरिका, जिसकी जनसंख्या 300 मिलियन है, के सकल घरेलू उत्पाद का पांचवा हिस्सा है। ऐसा क्यों? यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि विश्व की 35 फ़ीसदी जनसंख्या ईसाई है, लेकिन यही 35 फ़ीसदी लोग विश्व की 70 फ़ीसदी धन-संपत्ति के मालिक हैं।
     मानव विकास सूचकांक यानि एच॰डी॰आई॰ में भी यदि कुछ तेल निर्यात करने वाले देशों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी मुसलमान देश बहुत नीचे आते हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी मुसलमान देश बहुत पीछे हैं। विज्ञान के क्षेत्र में बस 500 शोधपत्र यानि पी॰एच॰डी जमा होते हैं। यह संख्या अकेले इंग्लैंड में 3000 है। 1901 से लेकर 2008 तक लगभग 500 नोबल पुरस्कारों में से यहूदियों को 140 बार यह पुरस्कार पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो लगभग 25 फ़ीसदी है। जबकि यहूदियों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की केवल 0.2 फ़ीसदी है। इसके विपरीत आज तक मात्र एक मुसलमान को यह पुरस्कार पाने का अवसर मिला है। (एक और भी था, लेकिन पाकिस्तान ने उसे गैर मुसलमान घोषित कर दिया) मतलब यह की मुसलमानों की इस पुरस्कार में भागीदारी 0.2 फ़ीसदी है यानि विज्ञान के क्षेत्र में मुसलमानों का योगदान नगण्य है। एक और नकारात्मक तथ्य निकल कर आया, शंघाई विश्वविध्यालय द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के आधार पर, इसमें विश्व के 400 सबसे बढ़ियाँ विश्वविध्यालय की एक सूची है और इस्लामी देशों का एक भी विश्वविध्यालय इस सूची में नहीं हैं। यह बड़ी दुःखद बात है, क्योंकि 7वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक दुनिया के सबसे बड़े और आलिम विश्वविध्यालय मुस्लिम देशों में स्थित थे। कोरडोबा, बग़दाद और काइरो इस्लामिक तालिम के नामचीन केंद्र थे।
     विज्ञान के जाने-माने इतिहासकार जिलेस्पी ने ऐसे 130 महान वैज्ञानिकों एंव और प्रौद्योगिक विशेषज्ञों की सूची बनाई है, जिनका मध्ययुग में बहुत बड़ा योगदान था इनमें से 120 ऐसे थे, जो मुसलमान देशों से थे और केवल 4 यूरोप से थे। क्या यह तथ्य ख़ुद में इतना अर्थपूर्ण नहीं की मुसलमान अपने भूत को विवेचित करें, अपने आज को ईमानदारी से देखें और अपने भविष्य की तार्किक रूप से कल्पना करें। मैं मुसलमानों की इस आबादी के बारे में कुछ और रोचक तथ्य बता सकता हूँ, जो अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किए गए शोधों पर आधारित हैं। आज की प्रजनन रफ्तार से मुसलमानों की जनसंख्या अगले 500 सालों में दोगुनी हो जाएगी। तब मुसलमान संख्या में ईसाईयों से अधिक हो जाएंगे, जिनकी जनसंख्या भी दोगुनी होगी। मतलब यह की मुसलमानों की समस्याएँ और बढ़ जाएंगी। आज की बेरोजगारी और आर्थिक ग़रीबी, जो मुस्लिम समाज और मुस्लिम देशों में व्याप्त है। वह ज़ाहिर तौर पर और बढ़ेगी। अगले 50 सालों में अगर मुस्लिम जनसंख्या बढ़कर दोगुनी हो गई तो मुसलमान और ईसाई देशों के बीच आर्थिक विकास की दूरी और बढ़ेगी। प्रश्न फिर यह उठता है कि इस शताब्दी या आने वाली सदी में विश्व पर किसकी सार्वभौमिकता और प्रभुसत्ता रहेगी, 5 फीसदी संसाधन वाले मुसलमानों कि या 70 फीसदी संसाधन वाले ईसाइयों की?
     मुसलमानों को यह याद रखने की जरूरत है कि आज के वैज्ञानिक विकास से परिभाषित विश्व में किसी भी देश की इज्ज़त और शक्ति उसकी जनसंख्या पर आधारित नहीं है। आज के विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ही शक्ति, इज्ज़त और संसाधनो की गारंटी है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां अधिक जनसंख्या के साथ आर्थिक पिछड़ापन और कम सामरिक सामर्थ्य है। यहूदी देश इज़राइल को देखिए, इतना छोटा देश पूरे अरब पर हावी रहता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह एक आर्थिक, सामरिक और वैज्ञानिक रूप से समृद्ध देश है, जिसके सामने पिछड़ेपन के शिकार अरब देशों को झुकना पड़ता है, हार मान लेनी पड़ती है। एक तरफ वे मुसलमान हैं, जो आज पश्चिमी देशों में रहते हैं और अपनी समृद्धि से खुश हैं। जबकि वहीं वे मुसलमान भी हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य देशों के बाशिंदे हैं और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन में डूबे हुए हैं। यूरोप में रहने वाले 20 मिलियन मुसलमानों का सकल घरेलू उत्पाद पूरे भारतीय महाद्वीप के 500 मिलियन मुसलमानों से अधिक है।
     निस्सीम हसन एक ख्याति प्राप्त इस्लामिक विद्वान हैं। वह कहते हैं कि मुसलमानों में ज्ञानार्जन की घटती प्रवृत्ति ही उनके आर्थिक और राजनीतिक पन का मुख्य कारण है। हमने सदियों से मानवता का नेतृत्व छोड़ दिया है। हम लकीर के फ़कीर बन कर रह गए हैं। महातिर मोहम्मद, जो मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री हैं, ने मुसलमानों को सही सलाह दी। उन्होने ओ॰आई॰सी॰ की मीटिंग में कहा की मुसलमानों को अपनी रूढ़िवादिता छोड़कर नए समय में नई पहचान बनानी चाहिए, क्योंकि सामाजिक परिस्थितियाँ अब बदल चुकी हैं। यह याद रखने की बात है की 8वीं से 14वीं शताब्दी के बीच जब मुसलमान स्पेन पर राज करते थे, तब स्पेन की आमनी बाकी सारे यूरोप से धिक थी। ऐसा इसलिए था, क्योंकि स्पेन तब उच्च शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। आज स्थिति उलट-पलट हो गई है। आज ईसाई स्पेन का सकल घरेलू उत्पादन विश्व के 12 तेल निर्यात करने वाले मुस्लिम देशों से कहीं अधिक है। मुस्लिम शासन के दौरान सभी देशों का इतना ही अच्छा हाल था। बग़दाद,मास्कस, काहिरा एंव त्रिपोली अपनी वैज्ञानिक दूरदृष्टि के लिए विख्यात थे। इन मध्ययुगीन शताब्दियों में मुस्लिम देशों को आर्थिक, सांस्कृतिक एंव बौद्धिक रूप से बहुत विकसित माना जाता था। इसके विपरीत डोनाल्ड कैम्बेल (सर्जन-फ्रांस) के अनुसार, जब मुस्लिम देशों में विज्ञान की आँधी चल रही थी, तब यूरोप अंधकार में जी रहा था, जब इस्लाम का उद्भव हो रहा था और वह संसार पर हावी हो रहा था, तब मुसलमानों की जनसंख्या बमुश्किल 10 फ़ीसदी थी।

डॉ एम॰आई॰एच फारुखी
(लेखक एन॰बी॰आर॰आई॰ के अवकाश प्राप्त वैज्ञानिक हैं)
संकलन: dharmendra61
सौजन्य: चौथी दुनिया